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Most Popular on 7th of May, 2021
प्राचीन काल में गाधि नामक एक राजा थे।उनकी सत्यवती नाम की एक पुत्री थी।राजा गाधि ने अपनी पुत्री का विवाह महर्षि भृगु के पुत्र से करवा दिया।महर्षि भृगु इस विवाह से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होने अपनी पुत्रवधु को आशीर्वाद देकर उसे कोई भी वर मांगने को कहा।


सत्यवती ने महर्षि भृगु से अपने तथा अपनी माता के लिए पुत्र का वरदान मांगा।ये जानकर महर्षि भृगु ने यज्ञ किया और तत्पश्चात सत्यवती और उसकी माता को अलग-अलग प्रकार के दो चरू (यज्ञ के लिए पकाया हुआ अन्न) दिए और कहा कि ऋतु स्नान के बाद तुम्हारी माता पुत्र की इच्छा लेकर पीपल का आलिंगन...

...करें और तुम भी पुत्र की इच्छा लेकर गूलर वृक्ष का आलिंगन करना। आलिंगन करने के बाद चरू का सेवन करना, इससे तुम दोनो को पुत्र प्राप्ति होगी।परंतु मां बेटी के चरू आपस में बदल जाते हैं और ये महर्षि भृगु अपनी दिव्य दृष्टि से देख लेते हैं।

भृगु ऋषि सत्यवती से कहते हैं,"पुत्री तुम्हारा और तुम्हारी माता ने एक दुसरे के चरू खा लिए हैं।इस कारण तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय सा आचरण करेगा और तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण सा आचरण करेगा।"
इस पर सत्यवती ने भृगु ऋषि से बड़ी विनती की।


सत्यवती ने कहा,"मुझे आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण सा ही आचरण करे।"तब महर्षि ने उसे ये आशीर्वाद दे दिया कि उसका पुत्र ब्राह्मण सा ही आचरण करेगा किन्तु उसका पौत्र क्षत्रियों सा व्यवहार करेगा। सत्यवती का एक पुत्र हुआ जिसका नाम जम्दाग्नि था जो सप्त ऋषियों में से एक हैं।
Most Popular on 6th of May, 2021
A #story from Bhagavatham
- #Krishna's childhood leelas

This sculpture depicts Krishna leela that happened when he crawled around with Ural/mortar that was tied with rope on his waist.

#Thread

📸 - A panel from Sri Amruteshwara Temple , Amruthapura,Karnataka


Bhagwan Krishna was a very naughty child.Yashoda being fed up by pranks of Krishna tied him to a mortar/ural with a rope after a great
https://t.co/AgI4HLU48u Krishna is called as Damodara- दाम(dam) means-rope,उदर (udara)means stomach. Later,Yashoda goes inside to do her work.


Left alone in the courtyard,
Krishna started moving about around with the mortar rolling behind him on the move.
On the way,there were 2 huge trees close to each other. Krishna crawled in between the trees & mortar got stuck in between.He tried to pull with all his strength.


As result,uproots twin trees causing them to fall down.The trees transform into 2 Gandharvas - Nalakuvara & Manigriva (sons of Kubera). They were cursed by Rishi Narada into becoming Arjuna trees.Liberated from curse,they thank Bhagwan Krishna.


📸- sculpture at Cheluvanaryana Temple,Melukote,Karnataka

All 📸 in this thread credit to TeamGsquare,stonestories and google
Source text - based on details in TeamGsquare,stonestories blogs
Most Popular on 5th of May, 2021
@jimmy_wales Thanks for replying!
1/. I will make a thread here with some details so you can see for yourself how a small clique of pro Chinese gatekeeping editors and admins have bullied editors, throttled dissent and gamed the system to impose their POV.

2/. I am a supporter of


3/. This is what I ended up feeling about WP after


4/. Some disturbing


5./ Some members of the gatekeeping
Most Popular on 4th of May, 2021
Most Popular on 3rd of May, 2021
Most Popular on 2nd of May, 2021
हिमालय पर्वत की एक बड़ी पवित्र गुफा थी।उस गुफा के निकट ही गंगा जी बहती थी।एक बार देवर्षि नारद विचरण करते हुए वहां आ पहुंचे।वह परम पवित्र गुफा नारद जी को अत्यंत सुहावनी लगी।वहां का मनोरम प्राकृतिक दृश्य,पर्वत,नदी और वन देख उनके हृदय में श्रीहरि विष्णु की भक्ति अत्यंत बलवती हो उठी।


और देवर्षि नारद वहीं बैठकर तपस्या में लीन हो गए।इन्द्र नारद की तपस्या से घबरा गए।उन्हें हमेशा की तरह अपना सिंहासन व स्वर्ग खोने का डर सताने लगा।इसलिए इन्द्र ने नारद की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को उनके पास भेज दिया।वहां पहुंच कामदेव ने अपनी माया से वसंतऋतु को उत्पन्न कर दिया।


पेड़ और पौधों पर रंग बिरंगे फूल खिल गए और कोयलें कूकने लगी,पक्षी चहकने लगे।शीतल,मंद,सुगंधित और सुहावनी हवा चलने लगी।रंभा आदि अप्सराएं नाचने लगीं ।किन्तु कामदेव की किसी भी माया का नारद पे कोई प्रभाव नहीं पड़ा।तब कामदेव को डर सताने लगा कि कहीं नारद क्रोध में आकर मुझे श्राप न देदें।

जैसे ही नारद ने अपनी आंखें खोली, उसी क्षण कामदेव ने उनसे क्षमा मांगी।नारद मुनि को तनिक भी क्रोध नहीं आया और उन्होने शीघ्र ही कामदेव को क्षमा कर दिया।कामदेव प्रसन्न होकर वहां से चले गए।कामदेव के चले जाने पर देवर्षि के मन में अहंकार आ गया कि मैने कामदेव को हरा दिया।

नारद फिर कैलाश जा पहुंचे और शिवजी को अपनी विजयगाथा सुनाई।शिव समझ गए कि नारद अहंकारी हो गए हैं और अगर ये बात विष्णु जी जान गए तो नारद के लिए अच्छा नहीं होगा।ये सोचकर शिवजी ने नारद को भगवन विष्णु को ये बात बताने के लीए मना किया। परंतु नारद जी को ये बात उचित नहीं लगी।
Most Popular on 1st of May, 2021
महाभारत की कहानी कौन नहीं जानता।लेकिन क्या आपको पता है कि महाभारत के ज्यादातर पात्र किसी न किसी श्राप में फंसे थे।अगर ये श्राप न होते तो कदाचित महाभारत की कहानी कुछ और होती।हिन्दु पौराणिक ग्रंथों में विभिन्न श्रापों का वर्णन मिलता है व हर श्राप के पीछे कोई कहानी अवश्य होती है।


आइए आज जानते हैं महाभारत कथा में वर्णित कुछ श्रापों के बारे में।

1) राजा पाण्डु को ऋषि किन्दम का श्राप

एकबार महाराज पाण्डु शिकार खेलने वन गए।झाडियों के पीछे कुछ हिल रहा था। मृग है सोचकर राजा ने बाण चलाया जो जाकर ऋषि किन्दम और उनकी पत्नी को लगा।वे दोनो रति-क्रीड़ा में लिप्त थे।

जब राजा ने उन्हें देखा तो बहुत दुखी हुए कि ये मुझसे क्या पाप हो गया।बहुत क्षमा याचना के बाद भी किन्दम ऋषि ने पाण्डु को श्राप दे दिया कि जब भी वो किसी स्त्री को काम भावना से स्पर्श करेंगे उसी क्षण उनकी मृत्यु हो जाएगी।पश्चाताप करने, वे सिंहासन पे अन्धे राजा धृतराष्ट्र को बैठाकर...


..स्वयं अपनी रानियों कुंती व माद्री के साथ वन चले गए।पांडवों का जन्म भी कुंती को ऋषि दुर्वासा द्वारा दिए गए मंत्र से हुआ था जिसमे किसी भी देव का स्मरण कर उस देव से कुंती,पुत्र प्राप्त कर सकती थी।एक बार माद्री पे मोहित हो जब पांडु ने उसे स्पर्श किया,उसी क्षण पांडु की मृत्यु होगयी।


2) उर्वशी का अर्जुन को श्राप

महाभारत युद्ध से पहले जब अर्जुन दिव्यास्त्र प्राप्त करने स्वर्ग गए तो वहां उर्वशी नाम की अप्सरा उन पर मोहित हो गयी। अर्जुन ने जब उन्हें अपनी माता के समान बताया तो यह सुनकर उर्वशी क्रोधित हो गयी और अर्जुन को श्राप दे डाला कि तुम नपुंसक की भांति...
A #Thread on SKANDGUPTA VIKRAMADITYA - THE SAVIOUR OF INDIA
Pls Read

भारत की मिट्टी में एक महान योद्धा स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य का जन्म हुआ। जब संसार की सारी प्राचीन सभ्यताओं नें सबसे खूंखार और बर्बर हूणों के सामने घुटने टेक दिए तब हूणों के आतंक का विनाश करने यह महान् योद्धा ..


स्कन्दगुप्त निकल पड़े जिनका पराक्रम पूरे विश्व में अमर हुआ।
परमवीर स्कन्दगुप्त के महाप्रताप को जानने के लिए ये हूण कौन थे, कहां से आए थे और क्या चाहते थे इसको पहले समझना होगा।


हूण एक अमानुष बर्बर जाति के लोग थे जिन्होंने यूनान, मिस्र, ग्रीस और रोम को राख का ढ़ेर बना दिया था। ये इतने बर्बर थे कि बच्चों को चीर फाड़ कर, महिलाओं की दुर्दशा करके, फिर उनको जला कर, भून‌ कर खाते थे।


तीसरी और चौथी इसवी तक हूणों के अत्याचारों से सम्पूर्ण यूरोप थर्रा उठा था और देखते ही देखते समूचा रोमन साम्राज्य भी अतीत का हिस्सा बन गया। खूंखार हूण जब अट्टहास कर के जब रूस की ओर बढ़े तो वोल्गा नदी रूस के लोगों के रक्त से लाल हो उठी।


चीन और मंगोलिया के उत्तर पश्चिमी हिस्सों में जन्में बर्बर हूण प्रजाति की घुसपैठ से महाकाय चीन भी त्राहि त्राहि कर रहा था। हूण सबसे पहले बच्चों को निशाना बनाते थे ताकि अगली पीढ़ी नष्ट हो जाए इसके बाद वो महिलाओं को उठा ले जाते थे और पुरुषों को तड़पा तड़पा कर मारते थे। ..