THREAD: 1) Hollywood Celebrities and the "Elites" (of DC & the Media) tell you it's an oppressive system because they not only preside over that system of YOUR oppression, they financially benefit from that illusion as they cash the check from their owner.

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मुंबईतील प्रसिद्ध किताबखाना ला लागलेली आग आपल्या सर्वांच्या मनाला चटका लावणारी होती. त्या आगीत सुमारे 95 लाख किमतीच्या 45,000 पुस्तकांचं नुकसान झालं. एकूण नुकसान दोन कोटींच्या घरात गेलं. तरीही किताबखाना पुन्हा सुरू करण्याचं स्वप्न आहे समीर आणि अमृता सोमैया यांचं.
#Thread

त्यांनीच दहा वर्षांपूर्वी मुंबईत ही सुंदर स्पेस तयार केली.त्यांच्या जगप्रवासात विविध पुस्तकांनी त्यांना वेड लावलं.अशी एक कम्युनिटी स्पेस मुंबईतही करायची,या ध्येयाने त्यांनी किताबखानाची निर्मिती केली.अमृताचे वडील प्रसिद्ध आर्किटेक्ट जगदीश मिस्त्री यांनी किताबखाना डिझाईन केला होता.

लाईव इवेंट्स, पुस्तक वाचन, काला घोडा फेस्ट्वलचे कार्यक्रम, उत्तमोत्तम पुस्तकं, लहान मुलांसाठीचा पुस्तकांचा स्वतंत्र विभाग ही किताबखानाची सर्व खासियत कायम राहणार आहे.
सध्या तिथे रिस्टोरेशनचं काम सुरू आहे. समीर आणि अमृता यांची मी घेतलेली मुलाखत आणि बातमी शेअर करत आहे.

दोन मार्चला किताबखाना वाचकांसाठी पुन्हा सुरू करायचा समीर आणि अमृता सोमैया यांचा प्रयत्न आहे. किताबखाना कॅफे आता इनहाऊस चालवला जाईल. @JairajSinghR @KitabKhanaBooks @UpadhyayaP12

Mumbai's iconic @KitabKhanaBooks is getting ready to reopen after gutted in fire and hit by the #Lockdown
My story via @timesofindia
Read what Samir and Amrita Somaiya have to say, who created this beautiful community space in #SoBo #Mumbai #Bookstore

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हिमालय पर्वत की एक बड़ी पवित्र गुफा थी।उस गुफा के निकट ही गंगा जी बहती थी।एक बार देवर्षि नारद विचरण करते हुए वहां आ पहुंचे।वह परम पवित्र गुफा नारद जी को अत्यंत सुहावनी लगी।वहां का मनोरम प्राकृतिक दृश्य,पर्वत,नदी और वन देख उनके हृदय में श्रीहरि विष्णु की भक्ति अत्यंत बलवती हो उठी।


और देवर्षि नारद वहीं बैठकर तपस्या में लीन हो गए।इन्द्र नारद की तपस्या से घबरा गए।उन्हें हमेशा की तरह अपना सिंहासन व स्वर्ग खोने का डर सताने लगा।इसलिए इन्द्र ने नारद की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को उनके पास भेज दिया।वहां पहुंच कामदेव ने अपनी माया से वसंतऋतु को उत्पन्न कर दिया।


पेड़ और पौधों पर रंग बिरंगे फूल खिल गए और कोयलें कूकने लगी,पक्षी चहकने लगे।शीतल,मंद,सुगंधित और सुहावनी हवा चलने लगी।रंभा आदि अप्सराएं नाचने लगीं ।किन्तु कामदेव की किसी भी माया का नारद पे कोई प्रभाव नहीं पड़ा।तब कामदेव को डर सताने लगा कि कहीं नारद क्रोध में आकर मुझे श्राप न देदें।

जैसे ही नारद ने अपनी आंखें खोली, उसी क्षण कामदेव ने उनसे क्षमा मांगी।नारद मुनि को तनिक भी क्रोध नहीं आया और उन्होने शीघ्र ही कामदेव को क्षमा कर दिया।कामदेव प्रसन्न होकर वहां से चले गए।कामदेव के चले जाने पर देवर्षि के मन में अहंकार आ गया कि मैने कामदेव को हरा दिया।

नारद फिर कैलाश जा पहुंचे और शिवजी को अपनी विजयगाथा सुनाई।शिव समझ गए कि नारद अहंकारी हो गए हैं और अगर ये बात विष्णु जी जान गए तो नारद के लिए अच्छा नहीं होगा।ये सोचकर शिवजी ने नारद को भगवन विष्णु को ये बात बताने के लीए मना किया। परंतु नारद जी को ये बात उचित नहीं लगी।