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திருநாங்கூர் 11 கருட சேவை விளக்கம்:

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11 திவ்யதேச ௭ம்பெ௫மான்களையும் ஒரே இடத்திலே கருட சேவையில் ஆழ்வா௫டன் ஸேவிக்கலாம்.

பதினொரு பெருமாள்களையும் ஒருங்கே தரிசிக்கும் பெரும் பாக்கியம்!


குலந்தரும் செல்வம் தந்திடும் அடியார் படுதுயர் ஆயினவெல்லாம்
நிலந்தரம் செய்யும் நீள் விசும்பருளும் அருளோடு பெருநிலமளிக்கும்
வலந்தரும் மற்றும் தந்திடும் பெற்ற தாயினும்ஆயின செய்யும்
நலம் தரும் சொல்லை நான் கண்டு கொண்டேன் நாராயணா என்னும் நாமமே.

திருமடந்தை மண்மடந்தை யிருபாலும் திகழத்
தீவினைகள் போயகல அடியவர்கட் கென்றும்
அருள் நடந்து இவ் வேழுலகத் தவர்பணிய வானோர்
அமர்ந்தேத்த இருந்தவிடம்
என்று ஆழ்வார்களால் போற்றப்படும் திருநாங்கூர் திவ்ய தேசத்தில்

பெருமாளை பெரிய திருவடியான கருட வாகனத்தில் சேவித்தால்
மறு பிறவி கிடையாது என்பது ஐதீகம்..

நாகை மாவட்டம், சீர்காழி அடுத்த நாங்கூரில் 108 வைணவ தலங்களில்
11 கோயில்கள் ஒரே பகுதியில் அமைந்துள்ள கோயில்களில் ஆண்டுதோறும் கருட சேவை உற்சவம் விமரிசையாக நடைபெறும்.
प्रस्तुत प्रसंग रामायण के सुंदरकांड में से लिया गया है जिसमें बहुत ही सरल तरीके से हनुमान जी की अन्तर्मन की भावनाओं से ये समझाया गया है कि ईश्वर की इच्छा बिना संसार में कुछ भी होना संभव नहीं।
अत: जो हुआ, जो हो रहा है और जो होगा, सब प्रभु की इच्छा से होगा।


अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध से भरकर, तलवार लेकर, सीता माता को मारने के लिए दौड़ पड़ा , तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीनकर, इसका सिर काट लेना चाहिए।


किन्तु अगले ही क्षण उन्होंने देखा कि मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया। ये देखकर वे गदगद हो उठे और ये सोचने लगे कि यदि मैं आगे बढ़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मैं न होता तो सीता जी को कौन बचाता?
बहुत बार हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है,
मैं न होता, तो क्या होता ?

परंतु ये क्या हुआ?
सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने स्वयं रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। तब हनुमान जी समझ गए कि प्रभु जिससे जो काम लेना चाहते हैं, वह उसीसे लेते हैं। कोई और चाहकर भी वह काम नहीं कर सकता।

आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बन्दर आया हुआ है और वह लंका जलाएगा।


तो हनुमान जी बड़ी चिंता में पड़ गए कि प्रभु राम ने तो लंका जलाने को कहा ही नहीं है और त्रिजटा कह रही है कि उन्होने स्वप्न में देखा है कि एक वानर ने लंका जलाई है। अब उन्हें क्या करना चाहिये। फिर उन्होने सोचा,'जो प्रभु कि इच्छा।'
रामायण के हर 1000 श्लोक के बाद आने वाले पहले अक्षर से गायत्री मंत्र बनता हैl

आपने बचपन से सुना होगा, कि जब भी किसी समस्या के कारण मन शांति खोने लगे तो ‘गायत्री मंत्र’ का जप करने से मन को शांति मिलती है. बल्कि अधिकतर प्रार्थनाओं में भी गायत्री मंत्र का उच्चारण किया जाता है.


बड़े-बुर्जुगों द्वारा कहा जाता है कि इस मंत्र के रोजाना उच्चारण करने मात्र से ही, कई समस्याओं और विपदाओं का नाश होता है. आपने भी ध्यान दिया होगा कि वेदों और पुराण में कई मंत्र ऐसे हैं जिनके बारे में कोई शायद ही जानता हो या फिर किसी को याद हो.


लेकिन ‘गायत्री मंत्र’ के बारे में अधिकतर लोग जानते हैं. शास्त्रों के अनुसार ‘गायत्री मंत्र’ की उत्पत्ति ऋषि विश्वामित्र ने अपने कठोर तप से की थी. ऋगवेद में यह मंत्र संस्कृत में लिखा गया था.


इसलिए गायत्री मंत्र का उच्चारण बहुत आवश्यक माना जाता है. गायत्री मंत्र से जुड़ी सबसे खास बात ये है कि इस मंत्र के उच्चारण से, होने वाले स्वास्थ्य लाभ के बारे में न केवल भारत में कई धारणाएं हैं


बल्कि विदेशों में भी समूह में गायत्री मंत्र का उच्चारण करने के लिए सेमिनार का आयोजन किया जाता है. दक्षिण अमेरिका में गायत्री मंत्र पर रोजाना विशेष कार्यक्रम, वहां के मुख्य रेडियो स्टेशनों पर किया जाता है...