Why You Should Not Sleep With Your Head Towards North?

The human body has a magnetic field, known as the heart's magnetic field, because of the flow of blood Earth is a giant magnet. When we sleep with our head towards the north,

our body’s magnetic field becomes completely asymmetrical to the Earth’s Magnetic field. That causes problems related to blood pressure and our heart needs to work harder to overcome this asymmetry of Magnetic fields. Apart from this, another reason is
that Our body has a significant amount of iron in our blood. When we sleep in this position, iron from the whole body starts to congregate in the brain. This can cause headaches, Alzheimer’s Disease, Cognitive Decline, Parkinson's disease, and brain degeneration.

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#ज्योतिष
कुछ दिन पहले एक जातक की कुंडली मे मंगल/राहु की स्थिति देखते हुए जाँच के लिए कहा था। रक्त में इंफेक्शन की पूर्ण संभावना थी जोकि सही भी निकली, विशुद्ध वैज्ञनिक ज्योतिष शास्त्र चिर सत्य है हम ज्योतिषों की गणना औऱ ज्ञान में कमी हो सकती है ज्योतिष शास्त्र कभी गलत नही होता।


शरीर व इसके घटकों पर ग्रहों के प्रभाव पर चर्चा करते हैं।

सूर्य-हड्डियों
चंद्र-शरीर का जल और श्वेत रक्त कणिकाएं(WBC)है
मंगल- रक्त मुख्यतः(RBC), दाँत
बुध-त्वचा
गुरु- वसा (fat),हॉर्मोन्स
शुक्र- विटामिन्स
शनि-मुख्यतःनसों का कारक है
राहु केतु और शनि मिलकर शरीर के मिनरल्स के कारक हैं।


किसी एक ग्रह के द्वारा जातक पर ग्रह के प्रभाव को नही कहा जा सकता इसके लिए उसकी डिग्री, दृष्टि संबंध, नक्षत्र, भाव, गोचर और भी बहुत कुछ देखा जाता है।

महादेव हम सब का कल्याण करें।🙏
नमः शिवाय🚩



@hathyogi31
@Itishree001
@Anshulspiritual
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@jhoola7
#ज्योतिष #बुध_ग्रह #उपाय

ज्योतिष में बुध ग्रह को बुद्धि ज्ञान, तर्क, त्वचा व वाणी का कारक माना गया है। कुंडली मे बुध की लाभकारी स्थिति जातक को बुद्धिमान, तार्किक, गणित और अकाउंट्स पर प्रभाव, ज्योतिष में रुचि, वाक्पटु बनाता है।


काव्य संगीत में रुचि, भाषणों/बोली के द्वारा प्रभाव डालने वाला , हँसमुख, कल्पनाशील, लेखनमे रुचि लेने वाला, व्यंगप्रेमी और हाजिरजवाब बनाता है।
ये सेल्स/मार्केटिंग के क्षेत्र में अग्रणी बनाता है।


वहीं बुध के नकारात्मक प्रभाव व्यक्ति को संकोची, बोलने में तुतलाना/हकलाना, सूंघने की क्षमता पर प्रभाव, व्यापार/कार्यक्षेत्र में हानि और दांतों से सम्बंधित समस्याएं देता है।
अलग अलग भाव मे बुध का प्रभाव अलग ही होता है साथ ही दृष्टि संबंध और युति के भी परिणाम बदल जाते हैं।


द्वितीय भाव मे ये बेबी फेस, चेहरे पर लावण्य और व्यक्ति को उसकी आयु से कम दिखाता है।
वैसे तो बुद्ध ग्रह का फ़लित व उपचार हर कुंडली के अनुसार अलग अलग होगा पर यहां कुछ ऐसे उपाय लिख रही हूँ जो सभी कर सकते हैं।
बुधवार को गाय को अंकुरित मूँग खिलाएँ।
बुध की दान सामग्री दान करें।


किन्नरों को हरे कपड़े और चूड़ियाँ दें।
छोटी कन्याओं का पूजन कर उन्हें हरे कपड़े/चूड़ियाँ और मिठाइयां देकर दक्षिणा दें।
माँ दुर्गा की आराधना करें
बहन बुआ बेटियों का सम्मान करें।
बहन को नाक का आभूषण(नाक की लौंग) दें।
तुलसी की सेवा करें सूखने पर तुरंत दूसरी लगा दें।
#ज्योतिष_विज्ञान #मंत्र_विज्ञान

ज्योतिषाचार्य अक्सर ग्रहों के दुष्प्रभाव के समाधान के लिए मंत्र जप, अनुष्ठान इत्यादि बताते हैं।

व्यक्ति के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति ही उसकी कुंडली बन जाती है जैसे कि फ़ोटो खींच लिया हो और एडिट करना सम्भव नही है। इसे ही "लग्न" कुंडली कहते हैं।


लग्न के समय ग्रहों की इस स्थिति से ही जीवन भर आपको किस ग्रह की ऊर्जा कैसे प्रभावित करेगी का निर्धारिण होता है। साथ साथ दशाएँ, गोचर इत्यादि चलते हैं पर लग्न कुंडली का रोल सबसे महत्वपूर्ण है।


पृथ्वी से अरबों खरबों दूर ये ग्रह अपनी ऊर्जा से पृथ्वी/व्यक्ति को प्रभावित करते हैं जैसे हमारे सबसे निकट ग्रह चंद्रमा जोकि जल का कारक है पृथ्वी और शरीर के जलतत्व पर पूर्ण प्रभाव रखता है।
पूर्णिमा में उछाल मारता समुद्र का जल इसकी ऊर्जा के प्रभाव को दिखाता है।


अमावस्या में ऊर्जा का स्तर कम होने पर वही समुद्र शांत होकर पीछे चला जाता है। जिसे ज्वार-भाटा कहते हैं। इसी तरह अन्य ग्रहों की ऊर्जा के प्रभाव होते हैं जिन्हें यहां समझाना संभव नहीं।
चंद्रमा की ये ऊर्जा शरीर को (अगर खराब है) water retention, बैचेनी, नींद न आना आदि लक्षण दिखाती है


मंत्र क्या हैं-
मंत्र इन ऊर्जाओं के सटीक प्रयोग करने के पासवर्ड हैं। जिनके जप से संबंधित ग्रह की ऊर्जा को जातक की ऊर्जा से कनेक्ट करके उन ग्रहों के दुष्प्रभाव को कम किया और शुभ प्रभाव को बढ़ाया जाता है।
कुंडली में 12 भाव होते हैं। कैसे ज्योतिष द्वारा रोग के आंकलन करते समय कुंडली के विभिन्न भावों से गणना करते हैं आज इस पर चर्चा करेंगे।
कुण्डली को कालपुरुष की संज्ञा देकर इसमें शरीर के अंगों को स्थापित कर उनसे रोग, रोगेश, रोग को बढ़ाने घटाने वाले ग्रह


रोग की स्थिति में उत्प्रेरक का कार्य करने वाले ग्रह, आयुर्वेदिक/ऐलोपैथी/होमियोपैथी में से कौन कारगर होगा इसका आँकलन, रक्त विकार, रक्त और आपरेशन की स्थिति, कौन सा आंतरिक या बाहरी अंग प्रभावित होगा इत्यादि गणना करने में कुंडली का प्रयोग किया जाता है।


मेडिकल ज्योतिष में आज के समय में Dr. K. S. Charak का नाम निर्विवाद रूप से प्रथम स्थान रखता है। उनकी लिखी कई पुस्तकें आज इस क्षेत्र में नए ज्योतिषों का मार्गदर्शन कर रही हैं।
प्रथम भाव -
इस भाव से हम व्यक्ति की रोगप्रतिरोधक क्षमता, सिर, मष्तिस्क का विचार करते हैं।


द्वितीय भाव-
दाहिना नेत्र, मुख, वाणी, नाक, गर्दन व गले के ऊपरी भाग का विचार होता है।
तृतीय भाव-
अस्थि, गला,कान, हाथ, कंधे व छाती के आंतरिक अंगों का शुरुआती भाग इत्यादि।

चतुर्थ भाव- छाती व इसके आंतरिक अंग, जातक की मानसिक स्थिति/प्रकृति, स्तन आदि की गणना की जाती है


पंचम भाव-
जातक की बुद्धि व उसकी तीव्रता,पीठ, पसलियां,पेट, हृदय की स्थिति आंकलन में प्रयोग होता है।

षष्ठ भाव-
रोग भाव कहा जाता है। कुंडली मे इसके तत्कालिक भाव स्वामी, कालपुरुष कुंडली के स्वामी, दृष्टि संबंध, रोगेश की स्थिति, रोगेश के नक्षत्र औऱ रोगेश व भाव की डिग्री इत्यादि।

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