Eggs & Aliens in Bisti Badlands : New Mexico
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Bisti Badlands in New Mexico look more like a dreamscape or Alienland than a landscape. Resting beneath them sit what only can be described as giant cracked eggs, as if Mother Nature was cooking breakfast only to accidently

drop a carton onto the desert’s sandy floor and abandon the shattered shells.

How did a bunch of giant eggs get to this desolate area? The true story starts 73 million years ago.

At one time, this 45,000acre of desert called the Bisti Badlands was completely submerged by a sea
called the Western Interior Seaway during the Cretaceous Period. As the water receded, layers of sandstone, mudstone, shale and other sedimentary rocks were revealed, creating the Kirtland Formation, only to be carved out by braided streams that flowed through the landscape.
The result is today’s dry, eerie badlands.

“Over time, erosion of the soft mudstone weathered away leaving behind channel deposits [that formed into the shape of eggs and hoodoos],” Paleontologists explains that the eggs get their colorful, speckled appearance due to mineral
deposits in the stream that cut through the sedimentary rock. “The eggs’ cracks are the result of differential weathering—mudstone weathers faster than other sediments, causing the formations to crack.”
The giant egg formations, which range from five to six-and-a-half feet long, aren’t the only reason to make a three-hour pilgrimage from Albuquerque. A petrified forest of juniper and other conifers makes the badlands even more post-apocalyptic.
And then there are the dinosaurs. Fossils—including dinosaur bones—have been found in the badlands, too.

Don’t jump to conclusions—though the huge eggs look like prehistoric creatures could have left them behind, their origins are entirely geological.
And the eggs aren’t the area’s only Easter-like treat: Bisti Badlands also boasts pastel-painted sunsets. If you catch them at the right time, you’ll see the bright yellow sun drop behind the landscape like an egg yolk into a bowl.

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शक्तिपीठ अलोपी देवी मंदिर प्रयागराज: जहां बिना मूर्ति की होती है पूजा 🙏🙏🚩🚩🚩
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प्रयागराज के अलोपीबाग में स्थित अलोपी देवी मंदिर को मां अलोपशंकरी का सिद्धपीठ मंदिर नाम से जाना जाता है। यहां मां सती के दाहिने हाथ का पंजा एक कुंड में गिरकर अलोप (लुप्त) हो गया था,


इसी वजह से इस शक्ति पीठ को अलोप शंकरी नाम दिया गया।अतः यह मंदिर मां शक्ति के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यह एक ऐसा खास मंदिर है, जहां कोई मूर्ति नहीं रखी गई है।


मंदिर प्रांगण के बीच के स्थान में एक चबूतरा है जहां एक कुंड बना हुआ है। इसके ऊपर एक खास झूला या पालना है, जिसे लाल कपड़े से ढंक कर रखा जाता है। मां सती की कलाई इसी स्थान पर गिरी थी। यह प्रसिद्ध शक्ति पीठ है और इस कुंड के जल को चमत्कारिक शक्तियों वाला माना जाता है।


आस्था के इस अनूठे मन्दिर में भक्त प्रतिमा की नहीं, बल्कि झूले या पालने की ही पूजा करते हैं।

यहां मान्यता है कि यहाँ कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधकर मन्नत माँगने वाले भक्तों की हर कामना पूरी होती है और हाथ में धागा बंधे रहने तक देवी उनकी रक्षा करती हैं। नवरात्रों में यहां मां का श्रृंगार तो नहीं होता, परंतु उनके स्वरूपों का पाठ किया जाता है।
अष्टभुजीदेवी- श्री कृष्ण की बहन 🙏🙏
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द्वापर युग से जुड़ी हुई यह अष्टभुजा मां भगवान कृष्ण की बहन है। श्रीमद्भागवत पुराण की कथा अनुसार पापी कंस ने अपनी मृत्यु के डर से अपनी बहन देवकी को पति सहित कारागार में कैद कर लिया था.


अपने विनाश के भय से वह देवकी की कोख से जन्म लेने वाले हर बच्चे को वध करता गया। देवकी के आठवें गर्भ से जन्में श्रीकृष्ण को वसुदेवजी ने कंस से बचाने के लिए रातोंरात यमुना नदी को पार गोकुल में नन्दजी के घर पहुंचा दिया था


तथा वहां यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा के जेल में ले आए थे। बाद में जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला तो वह कारागार में पहुंचा।


उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर पटककर जैसे ही मारना चाहा, वह कन्या अचानक कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुंच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित कर कंस के वध की भविष्यवाणी की और अंत में वह भगवती विन्ध्याचल वापस लौट गई और अष्टभुजी देवी के रूप मे स्थापित हुई।


यह विन्ध्यवासिनी देवी को समर्पित मन्दिर से तीन किमी की दूरी पर स्थित है। मन्दिर चमत्कारिक पहाड़ियों की पृष्ठभूमि में स्थित है और अपने शांत और सुन्दर दृश्यों के कारण भक्तों के साथ-साथ पर्यटकों के बीच भी लोकप्रिय है।
श्री राम की माता कौशल्या का इकलौता मंदिर
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रायपुर से तकरीबन 25 किलोमीटर दूर चंदखुरी गांव है। 126 तालाब वाले इस गांव में सात तालाबों से घिरे जलसेन तालाब के बीच प्राचीन द्वीप पर भगवान श्रीराम की माता कौशल्या की प्रतिमा स्थापित है और रामलला उनकी गोद में विराजमान हैं।


यहीं की थीं माता कौशल्या
स्थानीय लोगों की आस्था है कि चंदखुरी ही माता कौशल्या की जन्मस्थली है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि एक ही पत्थर में उभरी माता कौशल्या व भगवान श्रीराम की प्रतिमा गांव के जलसेन तालाब से ही प्राप्त हुई थी, जो आठवीं शताब्दी की है।


द्वीप पर स्थित कौशल्या माता का मंदिर हरियाली और मंदिरों से घिरा हुआ है। भगवान शिव और नंदी की विशाला प्रतिमा यहां स्थित है। द्वीप के द्वार पर हनुमान जी विराजमान हैं। दशरथ जी का दरबार यहां लगा है। मन्नत का एक पेड़ भी यहां स्थित है। सुषेण वैद्य की समाधी है।


माता कौशल्या के पिता सुकौशल थे, जिन्हें स्थानीय निवासी भानुमंत राजा के नाम से जानते हैं। छत्तीसगढ़ को पहले कौशल प्रदेश के नाम से जाना जाता था। वहीं माता सुबाला/अमृतप्रभा थीं। रामचरित मानस व वाल्मिकी रामायण में भी कौशल प्रदेश का उल्लेख मिलता है।


मंदिर परिसर में ही सीताफल का एक पेड़ है, जहां पर्ची में नाम लिखकर उसे श्रीफल के संग बांधा जाता है। कहा जाता है कि ऐसा कर मांगी गई मन्नत पूरी होती है। असल में जहां पेड़ है, उस स्थान पर पहले नागराज की बड़ी बाम्बी हुआ करती थी और मान्यता है कि मन्नत नागराज ही पूरी करते हैं।

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நான் உபதேசிக்கிறேன், கேள் என்று கூறி உபதேசித்தார். முதல் இரு சுலோகங்கள் சூழ்நிலையை விவரிக்கின்றன. மூன்றாவது சுலோகம் அகத்தியர் இராமபிரானை விளித்துக் கூறுவதாக அமைந்திருக்கிறது. நான்காவது சுலோகம் முதல் முப்பதாம் சுலோகம் வரை ஆதித்ய ஹ்ருதயம் என்னும் நூல். முப்பத்தி ஒன்றாம் சுலோகம்

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குழப்பங்களையும் நீக்குவது, வாழ்நாளை நீட்டிப்பது, மிகவும் சிறந்தது. இதயத்தில் வசிக்கும் பகவானுடைய அனுக்ரகத்தை அளிப்பதாகும்.
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சூரியன் உலக இயக்கத்திற்கு மிக முக்கியமானவர். சூரிய சக்தியால்தான் ஜீவராசிகள், பயிர்கள்