श्री राम की माता कौशल्या का इकलौता मंदिर
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रायपुर से तकरीबन 25 किलोमीटर दूर चंदखुरी गांव है। 126 तालाब वाले इस गांव में सात तालाबों से घिरे जलसेन तालाब के बीच प्राचीन द्वीप पर भगवान श्रीराम की माता कौशल्या की प्रतिमा स्थापित है और रामलला उनकी गोद में विराजमान हैं।

यहीं की थीं माता कौशल्या
स्थानीय लोगों की आस्था है कि चंदखुरी ही माता कौशल्या की जन्मस्थली है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि एक ही पत्थर में उभरी माता कौशल्या व भगवान श्रीराम की प्रतिमा गांव के जलसेन तालाब से ही प्राप्त हुई थी, जो आठवीं शताब्दी की है।
द्वीप पर स्थित कौशल्या माता का मंदिर हरियाली और मंदिरों से घिरा हुआ है। भगवान शिव और नंदी की विशाला प्रतिमा यहां स्थित है। द्वीप के द्वार पर हनुमान जी विराजमान हैं। दशरथ जी का दरबार यहां लगा है। मन्नत का एक पेड़ भी यहां स्थित है। सुषेण वैद्य की समाधी है।
माता कौशल्या के पिता सुकौशल थे, जिन्हें स्थानीय निवासी भानुमंत राजा के नाम से जानते हैं। छत्तीसगढ़ को पहले कौशल प्रदेश के नाम से जाना जाता था। वहीं माता सुबाला/अमृतप्रभा थीं। रामचरित मानस व वाल्मिकी रामायण में भी कौशल प्रदेश का उल्लेख मिलता है।
मंदिर परिसर में ही सीताफल का एक पेड़ है, जहां पर्ची में नाम लिखकर उसे श्रीफल के संग बांधा जाता है। कहा जाता है कि ऐसा कर मांगी गई मन्नत पूरी होती है। असल में जहां पेड़ है, उस स्थान पर पहले नागराज की बड़ी बाम्बी हुआ करती थी और मान्यता है कि मन्नत नागराज ही पूरी करते हैं।
कौशल्या मंदिर के पास ही सुषेण वैद की समाधी भी है। सुषेण/सुखैन वैद्य का उल्लेख रामायण में हुआ है। रामायण के अनुसार सुषेण वैद्य लंका के राजा राक्षस-राज रावण का राजवैद्य था। जब रावण के पुत्र मेघनाद के साथ हुए भीषण युद्ध में लक्ष्मण घायल होकर मूर्छित हो गए,
तब सुषेण वैद्य ने ही लक्ष्मण की चिकित्सा की थी। उसके यह कहने पर कि मात्र संजीवनी बूटी के प्रयोग से ही लक्ष्मण के प्राण बचाए जा सकते हैं, राम भक्त हनुमान ने वह बूटी लाकर दी और लक्ष्मण को नवजीवन मिला।लंका से भगवान राम के साथ सुषेण वैद्य भी आए थे और यहां ही उन्होंने प्राण त्यागा था।
जय श्री राम🙏🙏
जय माता कौशल्या🙏🙏

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शक्तिपीठ अलोपी देवी मंदिर प्रयागराज: जहां बिना मूर्ति की होती है पूजा 🙏🙏🚩🚩🚩
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प्रयागराज के अलोपीबाग में स्थित अलोपी देवी मंदिर को मां अलोपशंकरी का सिद्धपीठ मंदिर नाम से जाना जाता है। यहां मां सती के दाहिने हाथ का पंजा एक कुंड में गिरकर अलोप (लुप्त) हो गया था,


इसी वजह से इस शक्ति पीठ को अलोप शंकरी नाम दिया गया।अतः यह मंदिर मां शक्ति के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यह एक ऐसा खास मंदिर है, जहां कोई मूर्ति नहीं रखी गई है।


मंदिर प्रांगण के बीच के स्थान में एक चबूतरा है जहां एक कुंड बना हुआ है। इसके ऊपर एक खास झूला या पालना है, जिसे लाल कपड़े से ढंक कर रखा जाता है। मां सती की कलाई इसी स्थान पर गिरी थी। यह प्रसिद्ध शक्ति पीठ है और इस कुंड के जल को चमत्कारिक शक्तियों वाला माना जाता है।


आस्था के इस अनूठे मन्दिर में भक्त प्रतिमा की नहीं, बल्कि झूले या पालने की ही पूजा करते हैं।

यहां मान्यता है कि यहाँ कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधकर मन्नत माँगने वाले भक्तों की हर कामना पूरी होती है और हाथ में धागा बंधे रहने तक देवी उनकी रक्षा करती हैं। नवरात्रों में यहां मां का श्रृंगार तो नहीं होता, परंतु उनके स्वरूपों का पाठ किया जाता है।
अष्टभुजीदेवी- श्री कृष्ण की बहन 🙏🙏
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द्वापर युग से जुड़ी हुई यह अष्टभुजा मां भगवान कृष्ण की बहन है। श्रीमद्भागवत पुराण की कथा अनुसार पापी कंस ने अपनी मृत्यु के डर से अपनी बहन देवकी को पति सहित कारागार में कैद कर लिया था.


अपने विनाश के भय से वह देवकी की कोख से जन्म लेने वाले हर बच्चे को वध करता गया। देवकी के आठवें गर्भ से जन्में श्रीकृष्ण को वसुदेवजी ने कंस से बचाने के लिए रातोंरात यमुना नदी को पार गोकुल में नन्दजी के घर पहुंचा दिया था


तथा वहां यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा के जेल में ले आए थे। बाद में जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला तो वह कारागार में पहुंचा।


उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर पटककर जैसे ही मारना चाहा, वह कन्या अचानक कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुंच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित कर कंस के वध की भविष्यवाणी की और अंत में वह भगवती विन्ध्याचल वापस लौट गई और अष्टभुजी देवी के रूप मे स्थापित हुई।


यह विन्ध्यवासिनी देवी को समर्पित मन्दिर से तीन किमी की दूरी पर स्थित है। मन्दिर चमत्कारिक पहाड़ियों की पृष्ठभूमि में स्थित है और अपने शांत और सुन्दर दृश्यों के कारण भक्तों के साथ-साथ पर्यटकों के बीच भी लोकप्रिय है।
कबीरदास जी की पगड़ी
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एक बार संत कबीर ने बड़ी कुशलता से पगड़ी बनाई। झीना- झीना कपडा बुना और उसे गोलाई में लपेटा। हो गई पगड़ी तैयार। वह पगड़ी जिसे हर कोई बड़ी शान से अपने सिर सजाता हैं।


यह नई नवेली पगड़ी लेकर संत कबीर दुनिया की हाट में जा बैठे। ऊँची-ऊँची पुकार उठाई, 'शानदार पगड़ी ! जानदार पगड़ी ! दो टके की भाई ! दो टके की भाई !' एक खरीददार निकट आया। उसने घुमा- घुमाकर पगड़ी का निरीक्षण किया। फिर कबीर जी से प्रश्न किया, 'क्यों महाशय एक टके में दोगे क्या ?'

कबीर जी ने अस्वीकार कर दिया, 'न भाई ! दो टके की है। दो टके में ही सौदा होना चाहिए।' खरीददार भी नट गया। पगड़ी छोड़कर आगे बढ़ गया। यही प्रतिक्रिया हर खरीददार की रही।

सुबह से शाम हो गई। कबीर जी अपनी पगड़ी बगल में दबाकर खाली जेब वापिस लौट आए।

थके- माँदे कदमों से घर-आँगन में प्रवेश करने ही वाले थे कि तभी एक पड़ोसी से भेंट हो गई। उसकी दृष्टि पगड़ी पर पड़ गई। क्या हुआ संत जी, इसकी बिक्री नहीं हुई ? पड़ोसी ने जिज्ञासा की। कबीर जी ने दिन भर का क्रम कह सुनाया।

पड़ोसी ने कबीर जी से पगड़ी ले ली, आप इसे बेचने की सेवा मुझे दे दीजिए। मैं कल प्रातः ही बाजार चला जाऊँगा।

अगली सुबह कबीर जी के पड़ोसी ने ऊँची-ऊँची बोली लगाई, 'शानदार पगड़ी ! जानदार पगड़ी ! आठ टके की भाई ! आठ टके की भाई !'

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