The Patiala Necklace and Its Robbery (Which listed as one of the biggest lost treasures ever, valued around $ 30 Million Today)

The necklace created by the House of Cartier in 1928. It was made for Bhupinder Singh of Patiala,

who was the Maharaja of the princely state of Patiala.

The necklace had five chains (ladi) and included a neck collar. The necklace contained 2,930 diamonds, including as its centrepiece the world's seventh-largest diamond at the time, the "De Beers".
That diamond had a 428 carat pre-cut weigh, and it weighed 234.65 carats in its final setting.

It is the largest cushion-cut yellow diamond and the 2nd largest yellow faceted diamond in the world.The necklace also contained seven other large diamonds ranging from 18 to 73 carats
and a number of Burmese rubies.

The necklace disappeared from the Royal Treasury of Patiala around 1948.
In 1982, at a Sotheby's auction in Geneva, the "De Beers" diamond reappeared. There, the bidding went up to $3.16 million
In 1998, part of the necklace was found at a second-hand jewellery shop in London by Eric Nussbaum, a Cartier associate. The remaining large jewels were missing, including the Burmese rubies and the 18 to 73 carat diamonds that were mounted on a pendant.
Cartier purchased the incomplete necklace and, after four years, restored it to resemble the original. They replaced the lost diamonds with cubic zirconia and synthetic diamonds, and mounted a replica of the original "De Beers" diamond.
Source- Wikipedia

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बिजली के आविष्कारक - महर्षि अगस्त्य

राव साहब कृष्णाजी वझे ने १८९१ में विज्ञान संबंधी ग्रंथों की खोज के दौरान उन्हें उज्जैन में दामोदर त्र्यम्बक जोशी के पास अगस्त्य संहिता के कुछ पन्ने मिले।

इस संहिता के पन्नों में उल्लिखित वर्णन को पढ़कर नागपुर में संस्कृत के विभागाध्यक्ष


रहे डा. एम.सी. सहस्रबुद्धे को आभास हुआ कि यह वर्णन डेनियल सेल से मिलता-जुलता है। अत: उन्होंने नागपुर में इंजीनियरिंग के प्राध्यापक श्री पी.पी. होले को वह दिया और उसे जांचने को कहा। श्री अगस्त्य ने अगस्त्य संहिता में विधुत उत्पादन से सम्बंधित सूत्रों में लिखा:

संस्थाप्य मृण्मये पात्रे ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌।
छादयेच्छिखिग्रीवेन चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥

अगस्त्य संहिता :

अर्थात: एक मिट्टी का पात्र (Earthen pot) लें, उसमें ताम्र पट्टिका (copper sheet)


डालें तथा शिखिग्रीवा डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (wet saw dust) लगायें, ऊपर पारा (mercury‌) तथा दस्त लोष्ट (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो, उससे मित्रावरुणशक्ति का उदय होगा।

पर अब यहाँ थोड़ी सी हास्यास्पद स्थति उत्पन्न हुई।

उपर्युक्त वर्णन के आधार पर श्री होले


तथा उनके मित्र ने तैयारी चालू की तो
उपर्युक्त वर्णन के आधार पर श्री होले तथा उनके मित्र ने तैयारी चालू की तो शेष सामग्री तो ध्यान में आ गई,

परन्तु शिखिग्रीवा समझ में नहीं आया। संस्कृत कोष में देखने पर ध्यान में आया कि शिखिग्रीवा याने मोर की गर्दन।
क्या आप जानते हैं कि क्या है, पितृ पक्ष में कौवे को खाना देने के पीछे का वैज्ञानिक कारण!

श्राद्ध पक्ष में कौओं का बड़ा ही महत्व है। कहते है कौआ यम का प्रतीक है, यदि आपके हाथों दिया गया भोजन ग्रहण कर ले, तो ऐसा माना जाता है कि पितरों की कृपा आपके ऊपर है और वे आपसे ख़ुश है।


कुछ लोग कहते हैं की व्यक्ति मरकर सबसे पहले कौवे के रूप में जन्म लेता है और उसे खाना खिलाने से वह भोजन पितरों को मिलता है

शायद हम सबने अपने घर के किसी बड़े बुज़ुर्ग, किसी पंडित या ज्योतिषाचार्य से ये सुना होगा। वे अनगिनत किस्से सुनाएंगे, कहेंगे बड़े बुज़ुर्ग कह गए इसीलिए ऐसा करना

शायद ही हमें कोई इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण बता सके।

हमारे ऋषि मुनि और पौराणिक काल में रहने वाले लोग मुर्ख नहीं थे! कभी सोचियेगा कौवों को पितृ पक्ष में खिलाई खीर हमारे पूर्वजों तक कैसे पहुंचेगी?

हमारे ऋषि मुनि विद्वान थे, वे जो बात करते या कहते थे उसके पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण छुपा होता था।

एक बहुत रोचक तथ्य है पितृ पक्ष, भादो( भाद्रपद) प्रकृति और काक के बीच।

एक बात जो कह सकते कि हम सब ने स्वतः उग आये पीपल या बरगद का पेड़/ पौधा किसी न किसी दीवार, पुरानी

इमारत, पर्वत या अट्टालिकाओं पर ज़रूर देखा होगा। देखा है न?

ज़रा सोचिये पीपल या बरगद की बीज कैसे पहुंचे होंगे वहाँ तक? इनके बीज इतने हल्के भी नहीं होते के हवा उन्हें उड़ाके ले जा सके।

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🌺कैसे बने गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन और क्यों दो भागों में फटी होती है नागों की जिह्वा🌺

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