Classification of 5 classes of warriors according to the Puranas and Itihas ( Epic History) and Few of them according to their excellence

Rathi: A warrior capable of attacking 5,000 warriors simultaneously.
(Somadatta, Shakuni, Shishupala, Vrishasena)

Atirathi: A warrior capable of contending with 12 Rathi class warriors or 60,000 warriors simultaneously

( Shalya, Kripacharya, Yuyutsu, Drishtadyumna, Ghatotkacha, Angada, Duryodhana , Jayadhradha, Dusassana, Vikarna, Yudhishtir, Bhima, Nakula, Sahadeva)
Maharathi : A warrior capable of fighting 12 Atirathi class warriors or 720,000 warriors simultaneously

(Parshurama, Bhagwan Rama, Kumbhakarna, Lakshmana, Ravana, Arjuna,Lava & Kusha, Hanuman, Sugriva, Jambavan, Vali, Bhishma, Drona, Ashwatthama, Abhimanyu, Bhagwan Krishna,
Balrama, Bhagwan Narasimha)

Atimaharathi : A warrior capable of fighting 12 Maharathi warriors simultaneously. (Indrajeet)
Mahamaharathi : A warrior capable of fighting 24 Atimaharathi’s simultaneously.

(Shri Brahma ,Vishnu, Shiva, Maa Durga, Ganesha & kartikeya )

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अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता ।
अस वर दीन्ह जानकी माता ।।

“अष्ट सिद्धि” कौन सी हैं वो अष्‍ट सिद्धियां जिनके दाता महाबली हनुमान बताए गए हैं!

तुलसीदास जी द्वारा लिखी गई हनुमान चालीसा के इस दोहे को आपने न जाने कितनी बार सुना और दोहराया होगा

#JaiShaniDev #JaiShreeRam 🙏🏻🚩


तुलसीदास जी बताते हैं कि हनुमान जी आठ सिद्धियों से संपन्न हैं.

श्रीहनुमान रुद्र के ग्यारहवें अवतार हैं. वे कई गुणों, सिद्धियों और अपार बल के स्वामी हैं. इस चौपाई के अनुसार यह ‘अष्टसिद्धि’ माता सीता के आशीर्वाद से श्रीहनुमान जी को अपने भक्तों तक पहुंचाने को भी मिली है

इन शक्तियों के प्रभाव से ही हनुमानजी ने लंका को ऐसा उजाड़ा कि महाबली रावण न केवल दंग रह गया बल्कि उसका घमंड भी चूर हो गया.

ये हैं वे आठ सिद्धियां और उनसे होने वाले चमत्कारों का वर्णन

(1) अणिमा (2) महिमा (3) गरिमा (4) लघिमा (5) प्राप्‍ति (6) प्राकाम्‍य (7) ईशित्‍व (8) वशित्‍व ।

1- अणिमा 

महाबली हनुमान जी द्वारा प्रदान की जाने वाली ये सिद्धि बड़ी ही चमत्‍कारिक है। इस सिद्धि के पूर्ण हो जाने पर इंसान कभी भी अति सूक्ष्‍म रूप धारण कर सकता है। इस सिद्धि का उपयोग स्‍वयं महाकपि ने भी किया था। हनुमान जी ने इस सिद्धि का प्रयोग करते हुए ही

राक्षस राज रावण की लंका में प्रवेश किया था और सीता माता का पता लगाया था । यही नहीं सुरसा नामक राक्षसी के मुंह में बजरंगबली ने इसी सिद्धि के माध्‍यम से बाहर निकल आये थे

2- महिमा

इस सिद्धि को साध लेने वाला मनुष्‍य अपने शरीर को कई गुना विशाल बना सकता है।
क्या आप जानते हैं हिंदी वर्णमाला का प्रत्येक अक्षर तार्किक है और सटीक गणना के साथ क्रमिक रूप से रखा गया है। इस तरह का वैज्ञानिक दृष्टिकोण अन्य विदेशी भाषाओं की वर्णमाला में शामिल नहीं है।

भारतीय भाषाओं की वर्णमाला विज्ञान से भरी हुई हैं।

#हिन्दीदिवसकीहार्दिकशुभकामनाएं


क ख ग घ ड़ – पांच के इस समूह को “कण्ठव्य” कंठवय कहा जाता है क्योंकि इस का उच्चारण करते समय कंठ से ध्वनि निकलती है।

च छ ज झ ञ – इन पाँचों को “तालव्य” तालु कहा जाता है क्योंकि इसका उच्चारण करते समय जीभ ऊपर तालू को छूती है

बोल के देखें


ट ठ ड ढ ण  – इन पांचों को “मूर्धन्य” मुर्धन्य कहा जाता है क्योंकि इसका उच्चारण करते समय जीभ मुर्धन्य (ऊपर उठी हुई) महसूस करेगी।

त थ द ध न – पांच के इस समूह को दन्तवय कहा जाता है क्योंकि यह उच्चारण करते समय जीभ दांतों को छूती है।

🙏🏻 स्वयं करके देखें


प फ ब भ म – पांच के इस समूह को कहा जाता है ओष्ठव्य क्योंकि दोनों होठ इस उच्चारण के लिए मिलते हैं।

दुनिया की किसी भी अन्य भाषा में ऐसा #वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है! निःसंदेह, हमें अपनी ऐसी भारतीय भाषा पर गर्व होना चहिए!

पाणिनि के व्याकरण में  महेश्वर सूत्र है  जो कि संख्या में 14 है ,कहा जाता है कि ये स्वर महादेव के डमरू से निकले हुए ध्वनि है जिसके आधार पर व्याकरण की रचना की गई और भाषा का विकास
ऋषि, मुनि, महर्षि, साधु और संत में क्या अंतर होता है?

भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों का विशेष महत्व रहा है।आज से सैकड़ों साल पहले 'ऋषि', 'मुनि', 'महर्षि' और 'ब्रह्मर्षि' समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे. तब यही लोग अपने ज्ञान और तप के बल पर समाज कल्याण का कार्य किया


करते थे और लोगों को समस्याओं से मुक्ति दिलाते थे। आज के समय में हमें कई तीर्थ स्थलों, मंदिरों, जंगलों और पहाड़ों में साधु-संत देखने को मिल जाते हैं. लेकिन वे ऋषि-मुनियों की तरह इतने ज्ञानी नहीं होते.

आइए जानते हैं ऋषि, मुनि, महर्षि, साधु और संत में क्या अंतर है

ऋषि :~

ऋषि शब्द की व्युत्पत्ति 'ऋष' है जिसका अर्थ 'देखना' या 'दर्शन शक्ति' होता है।

ऋषि अर्थात "दृष्टा" भारतीय परंपरा में श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने (यानि यथावत समझ पाने) वाले जनों को कहा जाता है। वे व्यक्ति विशिष्ट जिन्होंने अपनी विलक्षण एकाग्रता के बल पर गहन ध्यान में


विलक्षण शब्दों के दर्शन किये उनके गूढ़ अर्थों को जाना व मानव अथवा प्राणी मात्र के कल्याण के लिये ध्यान में देखे गए शब्दों को लिखकर प्रकट किया। इसीलिये कहा गया -

“ऋषयो मन्त्र द्रष्टारः न तु कर्तारः।”

अर्थात् ऋषि तो मंत्र के देखनेवाले हैं नकि बनानेवाले

अर्थात् बनानेवाला तो केवल एक परमात्मा ही है

मुनि :~

मुनि वह है जो मनन करे, भगवद्गीता में कहा है कि जिनका चित्त दु:ख से उद्विग्न नहीं होता, जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निश्चल बुद्धिवाले मुनि कहे जाते हैं। वैदिक ऋषि जंगल के कंदमूल खाकर जीवन
Power Of Sanskrit 💪🏼
(The language of Gods)🙏🏻🚩

Longest Word in any Language of the World Literature from the “Varadāmbika Parinaya Champu” (a book in Sanskrit) of “Tirumalamba” (Female Kannada Writer) which dates back to 16th Century

(👇Listed in the “Guinness World Records”)


She wrote this book describing the marriage of the king who ruled The Vijayanagar Empire then, Emperor “Achyuta Deva Raya”. She lived in the Vijayanagar Empire which is in modern day Karnataka State of India

Contents and meaning of the world’s longest word 👇👇

निरन्तरान्धकारिता-दिगन्तर-कन्दलदमन्द-सुधारस-बिन्दु-सान्द्रतर-घनाघन-वृन्द-सन्देहकर-स्यन्दमान-मकरन्द-बिन्दु-बन्धुरतर-माकन्द-तरु-कुल-तल्प-कल्प-मृदुल-सिकता-जाल-जटिल-मूल-तल-मरुवक-मिलदलघु-लघु-लय-कलित-रमणीय-पानीय-शालिका-बालिका-करार-विन्द-गलन्तिका-गलदेला-लवङ्ग-पाटल-घनसार-कस्तूरिकातिसौरभ-

मेदुर-लघुतर-मधुर-शीतलतर-सलिलधारा-निराकरिष्णु-तदीय-विमल-विलोचन-मयूख-रेखापसारित-पिपासायास-पथिक-लोकान्

nirantarāndhakāritā-digantara-kandaladamanda-sudhārasa-bindu-sāndratara-ghanāghana-vr̥nda-sandehakara-syandamāna-makaranda-bindu-bandhuratara-mākanda-taru-kula-talpa-kalpa-mr̥dula-sikatā-jāla-jaṭila-mūla-tala-maruvaka-miladalaghu-laghu-laya-kalita-ramaṇīya-pānīya-śālikā-bālikā-

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