श्री कृष्ण सत्यभामा के प्रश्न का उत्तर देते कि उससे पहले ही गरुड़ बोल पड़े,"प्रभु!क्या मुझसे भी ज्यादा तीव्र गति से कोई इस सम्पूर्ण जग में उड़ सकता है।"
ये सुन सुदर्शन से भी नहीं रहा गया और वह भी बोल पड़ा,"भगवन!मैनें बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री दिलवाई है।
क्या संसार में मुझसे भी बड़ा कोई शक्तिशाली है।" तीनों की ये बातें सुन श्री कृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे और जान रहे थे कि इन सबमें अहंकार आ गया है जिसे नष्ट करना अति आवश्यक है।तब श्री कृष्ण ने उन तीनो से कहा,"मेरा एक परम भक्त है, हनुमान।तुम तीनों के प्रश्नों के उत्तर वही...
...भलीभांति दे पाएगा। हे गरुड़! तुम तो बड़ी तीव्र गति से उड़ते हो।तुम जाओ और हनुमान को ये कहकर बुला लाओ कि भगवान राम , माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रभु राम और माता सीता का नाम सुनकर वे दौड़े-दौड़े चले आएंगे।" गरुड़ भगवान की आज्ञा लेकर हनुमानजी को बुलाने उड़ चले।
इधर श्री कृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि देवी आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं द्वारकाधीश ने श्री राम का रूप धारण कर लिया।फिर श्री कृष्ण ने सुदर्शन को आज्ञा देते हुए कहा कि तुम महल के प्रवेशद्वार पर पहरा दो।ज्ञात रहे कि मेरी आज्ञा के बिना कोई भी महल में प्रवेश न करने पाए ।
सुदर्शन ने कहा,"जो आज्ञा भगवन।"
ये कहकर सुदर्शन चक्र महल के प्रवेशद्वार पर तैनात हो गया।
गरूड़ ने हनुमानजी के पास पहुंचकर कहा,"हे कपिश्रेश्ठ!प्रभु राम माता सीता के साथ द्वारका पधारे हैं और आपसे मिलने के लिए व्याकुल हैं।मुझे आपको बुलाने भेजा है।आप मेरे साथ चलिये।
मैं अपनी पीठ पे बैठा कर आपको शीघ्र ही आकाश मार्ग से उनके पास ले जाऊंगा।"
हनुमान ये सुनते ही भगवान श्री कृष्ण की सारी लीला को समझ गए कि वे उन्हें क्यों बुला रहे हैं।हनुमान ने विनयपूर्वक गरुड़ से कहा,"आप चलिये बन्धु ।मैं पीछे-पीछे आता हूँ ।"
गरुड़ अपने मन ही मन सोचने लगा कि पता नहीं ये बुड्ढा वानर कब पहुंचेगा।पर मुझे क्या,कभी भी पहुंचे।मेरा कार्य तो पूरा हो गया।मैं वापस चलता हूं।गरुड़ शीघ्रता से द्वारका की ओर उड़ चले।गरुड़ अभी रस्ते में ही होंगे कि हनुमान द्वारका पहुंच भी गए।प्रवेशद्वार पर सुदर्शन ने उन्हें रोक लिया।
सुदर्शन बड़े ही अहंकारी लहजे में बोला,"तुम अन्दर नहीं जा सकते।प्रभु ने किसी को भी अन्दर आने से मना किया है।" हनुमान मुस्कराए और बोले,"हे सुदर्शन!तुम मेरे मार्ग से हट जाओ।जब प्रभु राम अपने इस भक्त को स्वयं बुलावा भेजें तब मुझे उनसे मिलने में ज़रा सी भी देर करना पसंद नहीं ।"
पर सुदर्शन नहीं माना।तब हनुमानजी ने सुदर्शन को पकड़कर अपने मूंह में जिह्वा के नीचे दबा दिया और सहर्ष अपने प्रभु के दर्शन करने पहुंच गए।
श्री कृष्ण को श्री राम के रूप में देख हनुमान अत्यंत प्रसन्न होकर बोले,"हे प्रभु! आपके इस कृष्ण अवतार के दर्शन पाकर मैं धन्य हो गया।
मैं जानता हूं कि आप ही मेरे प्रभु राम हैं जो कृष्ण रूप में मेरे समक्ष बैठे हैं परंतु आपने माता सीता के स्थान पर ये किस दासी को इतना सम्मान दे दिया कि वो आपके साथ सिंहासन पर विराजमान है।"ये सुनकर रानी सत्यभामा को जो अपनी सुन्दरता पर अभिमान था वो पलभर में चूर हो गया।
तब श्री कृष्ण ने हनुमान को प्रेमपूर्वक अपने गले से लगा लिया और पूछा,"हे पवनपुत्र!मैने तो सुदर्शन से कहा था कि किसी को अन्दर न आने दे, उसने तुम्हें रोका नहीं?"
हनुमान ने मुस्कुराते हुए अपने मूंह से सुदर्शन चक्र को निकाला और कहा,"प्रभु!आपसे मिलने से मुझे क्या भला कोई रोक सकता है?
सुदर्शन ने रोकने का तनिक प्रयास किया था, इसलिए मैं इसे मूंह में रखकर आपसे मिलने चला आया।मुझे क्षमा करें।"
श्री कृष्ण मंद-मंद मुस्कुराते हुए इस पूरी लीला का आनन्द लेते रहे।
इतना सब होने के पश्चात गरुड़ हांफते हुए श्री कृष्ण के दरबार पहुंचे और हनुमानजी को उनके आने के पहले ही...
...वहां पहुंचा देख अचंभित हुए व लज्जा के मारे पानी पानी हो गए । गरुड़, सुदर्शन और सत्यभामा, तीनों ही भगवान की इस लीला को समझ गए और उनकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। तीनों ने श्री हनुमान को प्रणाम किया और प्रभु श्री कृष्ण के चरणों में झुक गए ।
इस प्रकार भगवान ने अपने भक्तों का अहंकार, अपने परम भक्त द्वारा ही दूर किया।
बोल सिया वर रामचंद्र की जय 💞🙏🌺
पवनसुत हनुमान की जय💞🙏🌺
देवकी नंदन कृष्ण भगवान की जय💞🙏🌺