@sarcasmXpert समये च प्रियालापः स्वयूथेषु च संनतिः।
अभिप्रेतस्य लाभश्च पूजा च जनसंसदि॥
समय पर प्रिय वचन बोलना, अपने लोगों में उन्नति, अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति और जनमानस में सम्मान - ये आठ (इससे पूर्व के दो श्लोक सहित) हर्ष के सार दिखाई देते हैं और ये अपने लौकिक सुख के साधन भी होते हैं।