Narayanagl Authors Vibhu Vashisth

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🌺आचमन क्या है और इसे तीन बार ही क्यों किया जाता है ?🌺

पूजा, यज्ञ आदि आरंभ करने से पूर्व शुद्धि के लिए मंत्र पढ़ते हुए जल पीना ही आचमन कहलाता है। इससे मन और हृदय की शुद्धि होती है।

धर्मग्रंथों में तीन बार आचमन करने के संबंध में कहा गया है।


प्रथमं यत् पिवति तेन ऋग्वेद प्रीणाति। यद् द्वितीयं तेन यजुर्वेदं प्रीणाति यद् तृतीयं तेन सामवेदं प्रीणाति॥

अर्थात् तीन बार आचमन करने से तीनों वेद यानी-ऋग्वेद,यजुर्वेद,सामवेद प्रसन्न होकर सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
मनु महाराज के मतानुसार
त्रिराचामेदपः पूर्वम्।
-मनुस्मृति2/60

अर्थात् सबसे पहले तीन बार आचमन करना चाहिए। इससे कंठशोषण दूर होकर, कफ़ निवृत्ति के कारण श्वसन क्रिया में व मंत्रोच्चारण में शुद्धता आती है। इसीलिए प्रत्येक धार्मिक कृत्य के शुरू में और संध्योपासन के मध्य बीच-बीच में अनेक बार तीन की संख्या में आचमन का विधान बनाया गया है।


इसके अलावा यह भी माना जाता है कि इससे कायिक, मानसिक और वाचिक तीनों प्रकार के पापों की निवृत्ति होकर न दिखने वाले फल की प्राप्ति होती है।

अंगूठे के मूल में ब्रह्मतीर्थ, कनिष्ठा के मूल प्रजापत्यतीर्थ, अंगुलियों के अग्रभाग में देवतीर्थ, तर्जनी और अंगूठे के बीच पितृतीर्थ और

हाथ के मध्य भाग में सौम्यतीर्थ होता है, जो देवकर्म में प्रशस्त माना गया है। आचमन हमेशा ब्रह्मतीर्थ से करना चाहिए। आचमन करने से पहले अंगुलियां मिलाकर एकाग्रचित्त यानी एकसाथ करके पवित्र जल से बिना शब्द किए 3 बार आचमन करने से महान फल मिलता है। आचमन हमेशा 3 बार करना चाहिए।