#ध्यान
ध्यान एक यौगिक प्रक्रिया है। ध्यानयोग की चरम उपलब्धि है - "समाधि"।
बिना समाधि को उपलब्ध हुए अन्तर्जगत् में प्रवेश नहीं किया जा सकता। अंतर्जगत का अर्थ है - सूक्ष्म जगत। जब तक सूक्ष्म जगत में प्रवेश कर, सूक्ष्म शरीर द्वारा साधना प्रारंभ नहीं की जाती,...

तब तक अध्यात्म का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। स्थूल शरीर से हज़ारों वर्ष साधना करते रहने से कोई उपलब्धि प्राप्त नहीं होती। मात्र स्वयं को भ्रान्ति में डाले रहना है कि हम साधना कर रहे हैं। साधना करना और साधना करने का भ्रम पालना अलग अलग है। जो व्यक्ति यह कहता है कि वह साधना करते हुए..
उस उच्च अवस्था को प्राप्त हो चुका है, जिसे समाधि की अवस्था कहते हैं, तो बहुत कुछ सम्भव है कि वह साधना- साधना कह कर साधना की मादकता में डूब जाने को ही साधना समझता हो।
साधना और साधना समझने की मादकता में ज़मीन-आसमान का अन्तर है।
बहुत से साधक जो अटल नहीं है, केवल भजनानंदी ही हैं। वह भजन- कीर्तन, पूजा - उपासना को ही साधना समझते हैं और उसी में मस्त रहते हैं।
पूजा-उपासना, भजन-कीर्तन का अपना महत्त्व होता है किन्तु, वह साधना नहीं होती। साधना होती है शरीर को साधना, प्राणों को साधना,...
मन को साधना और अन्त में आत्मा को साधना। सूक्ष्म शरीर से साधना करने को ही सही अर्थ में आध्यात्मिक साधना करने का प्रारंभ कहते हैं।
सूक्ष्म शरीर से साधना करते समय साधक का सूक्ष्म जगत के विभिन्न आयामों में प्रवेश स्वतः हो जाता है।
सूक्ष्म जगत में प्रवेश होने पर साधक के भौतिक शरीर का अतिक्रमण हो जाता है। साधक को भारहीनता का बोध होना प्रारंभ हो जाता है।
इसका एकमात्र कारण है - भूतत्व (पृथ्वी तत्व) का अतिक्रमण होना। इस स्थिति में साधक का समय बोध लुप्त हो जाता है। कब सबेरा होता है, कब साँझ होती है,...
कब क्या होता है, इन सबकी प्रतीति नहीं होती है साधक (ध्यानकर्ता) को।
भौतिक जगत का अस्तित्व साधक के लिए न के बराबर हो जाता है। सारा जीवन अंतर्मुखी हो जाता है। ध्यान की सीमा और अवधि बढ़ती जाती है। अन्त में एक ऐसी अवस्था आती है जब वह पूर्णतया समाधिस्थ हो जाता है।
अब पहली बार सूक्ष्म शरीर में अपने अस्तित्व का बोध करता है साधक। स्थूल शरीर भी है और स्थूल जगत में भी है अस्तित्व, इन दोनों की स्मृति का अभाव हो जाता है उसके लिए।
अब तक इस संसार में जितने भी गूढ़, गोपनीय और रहस्यमय विषय अवतरित हुए हैं,...
वे सब समाधि की अवस्था में ही अवतरित हुए हैं, जिन्हें ऋतम्भरा वाणी द्वारा सर्वप्रथम ऋषियों ने सूत्रों का रूप दिया था जिन्हें समझ पाना सर्वसाधारण के वश की बात नहीं है।
वर्तमान समय में एक पूर्ण योग्य और पूर्ण विवेकशील व्यक्ति का दर्शन दुर्लभ हो गया है और...
यही एकमात्र कारण है कि आज, प्रत्येक व्यक्ति मानसिक रूप से अस्थिर है। वे उद्भ्रान्त हैं और तनावग्रस्त हैं। वह क्या करना चाहता है और क्या कर रहा है इसका बोध उसे नहीं। और यही एकमात्र कारण है कि इस समय जितने भी रोग और जितनी भी व्याधियां हैं उनमें 80 प्रतिशत मन से सम्बंधित हैं...
...शरीर से नहीं। यदि भविष्य में भी ऐसी ही स्थिति रही तो एक दिन ऐसा आएगा जब 100 प्रतिशत लोग मानसिक रूप से रुग्ण हो जायेंगे।
शरीर के प्रति दो दृष्टियां हैं। वे दो दृष्टियां हैं - "भोग और त्याग"। जो इन दोनों से ऊपर उठ जाता है अर्थात् न भोग और न त्याग,...
वही साधक सफल होता है।

जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, जो भी महत्वपूर्ण है और जो भी उपलब्ध करने योग्य है, उसका मार्ग शरीर के भीतर ही है। समस्त ब्रह्माण्ड में, जो भी बाहर है, वही आपके इस भौतिक शरीर के अंदर है। आध्यात्मिक यात्रा का प्रारंभ अंतर मन से कीजिये, भौतिक जगत आपको भ्रमित करेगा।
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हरे कृष्णा! 🙏🏻
जय जय श्री राधे!! 🙌🏻

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आप सभी ने सोरहा, सौरठा और बधाई के बारे में सुना या पढ़ा होगा? बृज क्षेत्र में बच्चे के जन्मोत्सव के समय बधाईयाँ बजाते हैं, गाते हैं। ऐसी ही एक बधाई-सोरहा मैं आपको बताती हूँ, आप भी गा सकते हो -

श्रीराम जन्मोत्सव बधाई 🙏🏻
राजा जू के आँगने री बधाइया बाजै।
पुत्र जन्म उत्सव अति आनंद,


आढ़यो बहुती भागने री।
छठी दिवस कुल रीति कीन्ह सब,
रात दिवस लव लागने री।
विविध बाजने बजत मधुर मधु,
सोहिल सुखकर रागने री।
गायक गुनी बिदूषक निज निज,
करहिं कला कल पागने री।
नचहिं अपसरा नारि नगर की,
बीती रजनी जागने री।
भूमि अकाश अनन्द अथाही,
देव मुनी नर नागने री।


पुष्प-इन-घन वर्षत सबहीं,
हर्षण हर्षित मागने री।।

आप सभी श्री राम-जन्म के बधाई महोत्सव की अनन्त शुभकामनाएँ। 🙏🏻😊

#रामनवमी_की_हार्दिक_शुभकामनाएं
#जयश्रीराम #रामनवमी२०२२

जय श्री राम! 🙌🏻💐
विज्ञप्ति जारी (आवश्यक सूचना) :

-जोशीमठ, चमोली
(आश्विन कृष्ण चतुर्दशी तदनुसार दिनांक 5 अक्टूबर 2021)

ज्योतिर्मठ में आयोजित होगा शारदीय नवरात्रि महोत्सव :- आगामी 7 अक्टूबर से पूरे देश में शारदीय नवरात्रि में शक्ति उपासना का क्रम शुरू हो जाएगा।

चतुराम्नाय शांकर पीठ में अन्यतम ज्योतिर्मठ जिसे 'श्रीमठ' भी कहा जाता है।

इस शक्ति क्षेत्र में विविध क्रम से साधक अपनी - अपनी 'शक्ति' उपासना और आराधना सम्पन्न करते हैं।

उत्तर भारत की आध्यात्मिक राजधानी 'ज्योतिर्मठ' जो कि उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ में स्थित है।

वहां पर स्थापित तोटकाचार्य गुफा ज्योतिष्पीठ परिसर में प्रतिवर्ष की भांति इस बार भी अखिलकोटिब्रहाण्ड नायिका राजराजेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी माता जी की भव्य आराधना कार्यक्रम सम्पन्न होगा।

ज्योतिष्पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज ने...

भगवती के श्रृंगार के लिए रजत मुकुट और ६४ योगिनी देवियों के लिए विशेष वस्त्र और श्रृंगार सामग्री प्रेषित की है।
शारदीय नवरात्रि के अवसर पर देवी जी के प्रांगण में सविधि कलशस्थापन कर प्रतिदिन माता जी की विशेष आराधना, महाश्रृंगार के साथ ही योगिनियों की पूजा का क्रम भी सम्पन्न होगा।

उपरोक्त सभी कार्यक्रम शंकराचार्य जी महाराज के प्रतिनिधि पूज्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती जी महाराज के कुशल मार्गदर्शन व ब्रह्मचारी श्रवणानन्द जी एवं ब्रह्मचारी मुकुन्दानन्द जी के सान्निध्य में सम्पन्न होगा।

मुख्य यजमान के रूप में भगवती ने इस सेवा का अवसर...
#समुद्र_मंथन से प्राप्त #चौदह_रत्नों का #रहस्य :- (First Part)
यह वह समय था, जब देवगण पृथ्वी पर रहते थे। पृथ्वी पर वे हिमालय के उत्तर में रहते थे। कार्य था पृथ्वी का निर्माण करना तथा उसको रहने हेतु उपयुक्त बनाना और पृथ्वी पर मानव सहित अन्य प्रजातियों (जीवों) का विस्तार करना।

देवताओं के साथ यहाँ दैत्य भी निवास करते थे। तब पृथ्वी मात्र एक द्वीप ही थी, अर्थात पृथ्वी का एक ही भाग जल से बाहर निकला हुआ था। यह भी बहुत छोटा-सा भाग था। जल के बीचो बीच था मेरू पर्वत।

पृथ्वी के विस्तार और इस पर विविध प्रकार के...

जीवन निर्माण के लिए देवताओं के भी इष्ट ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश ने लीला रची और उन्होंने देवगण तथा दैत्यगण की शक्त्ति का उपयोग कर समुद्र मंथन कराया। समुद्र मंथन कराने के लिए सर्वप्रथम कारण निर्मित किया गया।

ऋषि दुर्वासा ने अपना अपमान होने के कारण...

देवराज इन्द्र को ‘श्री’ (लक्ष्मी ) से हीन हो जाने का शाप दे दिया।

भगवान श्री हरि विष्णु ने इंद्र को शाप-मुक्त्ति के लिए दैत्यों के साथ 'समुद्र मंथन' के लिए कहा और दैत्यों को अमृत का लालच दिया। इस तरह हुआ समुद्र मंथन।

यह समुद्र था क्षीर सागर जिसे आज हिन्द महासागर कहते हैं।

जब देवताओं तथा दैत्यों ने समुद्र मंथन आरंभ किया, तब भगवान विष्णु ने कच्छप बनकर मंथन में भाग लिया।

वे समुद्र के बीचो बीच में स्थिर हो गये और उनके ऊपर रखा गया मंदराचल पर्वत। फिर वासुकी नाग को रस्सी बनाकर एक ओर से देवता और दूसरी ओर से दैत्यों ने समुद्र का मंथन करना प्रारंभ कर दिया।
#Series name : "Shiva - the voice of nature!" 1st part 👇🏻
Let's start with #Kashi, the city of Lord Shiva.

•Kashi is mentioned in the Rigveda, the oldest text of the world - 'काशिरित्ते.. आप इवकाशिनासंगृभीता!'
According to the Puranas, this is a proto-Vaishnavite place. https://t.co/xqTcrEjVzo


•Earlier it was the puri of Lord Vishnu (Madhava). Where Sri Harike's Anandashru had fallen, Bindusarovar was formed and the Lord was enshrined here in the name of Bindhumadhava.

There is such a story that when Lord Shankar cut off the fifth head of Lord Brahma in anger,...

...he got clinging to his deeds. Even after traveling in many pilgrimages for twelve years, that head did not separate from them. But as soon as he entered the border of Kashi, Brahmahatya left him and that skull also fell apart. The place where this incident took place...

...was called Kapalmochan-teerth.

Mahadev liked Kashi so much that he asked this holy puri from Vishnu for his regular residence. Since then Kashi became his abode.

According to Harivansh Purana, the Bharatvanshi king who settled Kashi was 'Kash'.

According to some scholars, Kashi is a city even before the Vedic period.

Being the oldest center of worship of Shiva, this belief seems to have originated; Because in general "Shivopasana" is considered to be of pre-vedic period.
#कर्मफल तो भोगने ही पड़ेंगे, इस जन्म या अगले जन्म :

एक राजा बड़ा धर्मात्मा, न्यायकारी और ईश्वर का भक्त था। उसने ठाकुर जी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया। वह ब्राह्मण बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था।


वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव से बहुत प्रसन्न था। उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष बीत गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया।

राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ था। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर...

विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी। शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी।

वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित...

मूठेवाली एक तलवार पड़ी है।

जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी व डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी।

राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया।

राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करने लगी। उसने इसगवार से प्रार्थना की कि, 'हे प्रभु! मुझसे अचानक यह पाप कैसे हो गया? पति की मृत्यु मेरे ही हाथों हो गयी। आप तो जानते ही हैं, परंतु सभा में मैं सत्य न कहूँगी क्योंकि...

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#ArudraDarisanam
Unique Natarajar made of emerlad is abt 6 feet tall.
It is always covered with sandal paste.Only on Thriuvadhirai Star in month Margazhi-Nataraja can be worshipped without sandal paste.


After removing the sandal paste,day long rituals & various abhishekam will be
https://t.co/e1Ye8DrNWb day Maragatha Nataraja sannandhi will be closed after anointing the murthi with fresh sandal paste.Maragatha Natarajar is covered with sandal paste throughout the year


as Emerald has scientific property of its molecules getting disturbed when exposed to light/water/sound.This is an ancient Shiva temple considered to be 3000 years old -believed to be where Bhagwan Shiva gave Veda gyaana to Parvati Devi.This temple has some stunning sculptures.