कौरव और पांडवों के बीच जब राज्य बंटवारे को लेकर कलह चली, तो मामा शकुनि की अनुशंसा पर धृतराष्ट्र ने खांडवप्रस्थ नामक एक जंगल को देकर पांडवों को कुछ समय तक के लिए शांत कर दिया था। इस जंगल में एक महल था जो खंडहर हो चुका था। पांडवों के समक्ष अब उस जंगल को एक नगर बनाने की चुनौती थी।
खांडववन में अग्नि धधकने लगी और उसकी ऊंची ऊंची लपटे आकाश तक पहुंच गई।खांडववन को अग्नि 15 दिन तक जलाती रही।इस अग्निकाण्ड में केवल छह प्राणी ही बच पाते हैं।अश्वसेन सर्प, मयदानव(मयासुर)और चार शार्ड्ग पक्षी। आओ जानते हैं कि अश्वसेन सर्प कौन था।
कर्ण को इस बात का अंदाजा भी नहीं था परंतु श्रीकृष्ण ने अपनी दूरदृष्टि से यह देख लिया था। अत: जैसे ही कर्ण ने वह बाण छोड़ा, श्रीकृष्ण ने रथ के घोड़ों को जमीन पर बैठा दिया। बाण अर्जुन का मुकुट काटता हुआ ऊपर से निकल गया।
कर्ण ने उसे आश्चर्य से देखा और पूछा,"तुम कौन हो और कहां से आए हो?"
तब सर्प ने कहा,"हे दानवीर कर्ण! मैं अर्जुन से बदला लेने के लिए आपके तरकश में बाण बनकर जा बैठा था।"
इस पर सर्प ने कहा,"राजन! एक बार अर्जुन ने खांडव वन में आग लगा दी थी। उस आग में मेरी माता जलकर मर गई थी,तभी से मेरे मन में अर्जुन के प्रति प्रतिशोध की भावना है। मैं कबसे उससे प्रतिशोध लेने का अवसर तलाश रहा था जो मुझे आज मिला है। आप मुझे बस तीर के
स्थान...
सर्प की बात सुनकर कर्ण सहजता से बोले,"हे सर्पराज! आप गलत कार्य कर रहे हैं।जब अर्जुन ने खण्डव वन में आग लगाई होगी तो उनका उद्देश्य तुम्हारी माता को जलाना कभी नहीं रहा होगा।