महान गणितज्ञ आर्यभट ने अपनी पुस्तक ‘आर्यभटीय’ में 120 सूत्र दिए. पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना, पाई का सटीक मान, सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की व्याख्या, समयगणना, त्रिकोणमिति, ज्यामिति, बीजगणित आदि के कई सूत्र व प्रमेय

आधुनिक विज्ञान से कई वर्षों पहले हमें आर्यभट द्वारा रचित ‘आर्यभटीय’ में मिलते हैं.

1. 🌺🌺🌺पृथ्वी का घूमना🌺🌺🌺

अनुलोमगतिर्नौस्थः पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत्।
अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लंकायाम्।।
(आर्यभटीय, गोलपाद, श्लोक 9)
अर्थ: जिस प्रकार से नाव में बैठा हुआ मनुष्य जब प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है तो उसे लगता है कि पेड़-पौधे, पत्थर और पर्वत आदि उल्टी गति से जा रहे हैं. उसी प्रकार अपनी धुरी पर घूम रही पृथ्वी से जब हम नक्षत्रों की ओर देखते हैं तो वे उल्टे दिशा में जाते हुए दिखाई देते हैं.
इस श्लोक के जरिए आर्यभट ये समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि पृथ्वी भी अपनी धुरी पर घूमती है.

2. 🌺🌺🌺पाई का मान🌺🌺🌺

चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।
अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥
(आर्यभटीय, गणितपाद, श्लोक 10)
अर्थ: 100 में चार जोड़ें, आठ से गुणा करें और फिर 62000 जोड़ें. इस नियम से 20000 परिधि के एक वृत्त का व्यास ज्ञात किया जा सकता है.
(100 + 4) x 8 +62000/ 20000= 3.1416
इसके अनुसार व्यास और परिधि का अनुपात (2πr/2r) यानी 3.1416 है, जो पांच महत्वपूर्ण आंकड़ों तक बिलकुल सटीक है.
3. 🌺🌺🌺त्रिभुज का क्षेत्रफल🌺🌺🌺
त्रिभुजस्य फलशरीरं समदलकोटि भुजार्धसंवर्गः
(आर्यभटीय,गणितपाद,श्लोक 6)

अर्थ:किसी त्रिभुज का क्षेत्रफल,लम्ब के साथ भुजा के आधे के (गुणनफल के) परिणाम के बराबर होता है.

4. 🌺🌺🌺सूर्यग्रहण-चंद्रग्रहण🌺🌺🌺

चंद्रो जलमर्को अग्निर्मृद भूश्छयापी या
तमस्तद्धी।
छादयति शशि सूर्यम् शशिनं महती च भूच्छाया।।
(आर्यभटीय, कालक्रियापाद, श्लोक 37)

अर्थ: चन्द्रमा जल स्वरुप है, सूर्य अग्निस्वरुप है और भूमि मृत्तिकामय है। भूमि की छाया तम है अर्थात् अंधकार है। सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा सूर्य को आच्छादित कर लेता है और चन्द्रग्रहण में
पृथिवी की छाया चन्द्रमा को ढक लेती है।

6-🌺🌺🌺 सूर्योदय-सूर्यास्त🌺🌺🌺

भूमि गोलाकार होने के कारण विविध नगरों में रेखांतर होने के कारण अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग समय पर सूर्योदय व सूर्यास्त होते हैं। इसे आर्यभट्ट ने ज्ञात कर लिया था, वे लिखते हैं-
उदयो यो लंकायां सोस्तमय: सवितुरेव सिद्धपुरे।
मध्याह्नो यवकोट्यां रोमक विषयेऽर्धरात्र: स्यात्‌॥
(आर्यभट्टीय गोलपाद-१३)

अर्थात्‌ - जब लंका में सूर्योदय होता है तब सिद्धपुर में सूर्यास्त हो जाता है। यवकोटि में मध्याह्न तथा रोमक प्रदेश में अर्धरात्रि होती है।
स्रोत: आर्यभट द्वारा रचित ‘आर्यभटीय’

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हाबूर पत्थर
गजब हैं !!!
मेरी धरती मैया
दही जमा देनें वाला
दही जमाने के लिए लोग अक्सर जामन ढूंढ़ते नजर आते हैं... वहीं राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित इस गांव में जामन की जरूरत नहीं पड़ती है...यहां ऐसा पत्थर है जिसके संपर्क में आते ही दूध जम जाता है...


इस पत्थर पर विदेशों में भी कई बार रिसर्च हो चुकी है...फॉरेनर यहां से ले जाते हैं इस पत्थर के बने बर्तन
स्वर्णनगरी जैसलमेर का पीला पत्थर विदेशों में अपनी पहचान बना चुका है. इसके साथ ही जिला मुख्यालय से 40 किमी दूर स्थित हाबूर गांव का पत्थर अपने आप में विशिष्ट खूबियां समेटे हुए है

..इसके चलते इसकी डिमांड निरंतर बनी हुई है...हाबूर का पत्थर दिखने में तो खूबसूरत है ही, साथ ही उसमें दही जमाने की भी खूबी है... इस पत्थर का उपयोग आज भी जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में दूध को जमाने के लिए किया जाता है... इसी खूबी के चलते यह विदेशों में भी काफी लोकप्रिय है..

इस पत्थर से बने बर्तनों की भी डिमांड बढ़ गई है..।

कहा जाता है कि जैसलमेर पहले अथाह समुद्र हुआ करता था और कई समुद्री जीव समुद्र सूखने के बाद यहां जीवाश्म बन गए व पहाड़ों का निर्माण हुआ.. हाबूर गांव में इन पहाड़ों से निकलने वाले इस पत्थर में कई खनिज व अन्य जीवाश्मों की भरमार है.

जिसकी वजह से इस पत्थर से बनने वाले बर्तनों की भारी डिमांड है। साथ ही वैज्ञानिकों के लिए भी ये पत्थर शोध का विषय बन गया है... इस पत्थर से सजे दुकानों पर बर्तन व अन्य सामान पर्यटकों की खास पसंद होते हैं
पूर्वांचल के महान क्रान्तिवीर शम्भुधन फूंगलो

भारत में सब ओर स्वतन्त्रता के लिए प्राण देने वाले वीर हुए हैं। ग्राम लंकर (उत्तर कछार, असम) में शम्भुधन फूंगलो का जन्म फागुन पूर्णिमा, 1850 ई0 में हुआ। डिमासा जाति की कासादीं इनकी माता तथा देप्रेन्दाओ फूंगलो पिता थे।


शम्भुधन के पिता काम की तलाश में घूमते रहते थे। अन्ततः वे माहुर के पास सेमदिकर गाँव में बस गये। यहीं शम्भुधन का विवाह नासादी से हुआ।

शम्भु बचपन से ही शिवभक्त थे। एक बार वह दियूंग नदी के किनारे कई दिन तक ध्यानस्थ रहे। लोगों के शोर मचाने पर उन्होंने आँखें खोलीं और कहा

कि मैं भगवान शिव के दर्शन करके ही लौटूँगा। इसके बाद तो दूर-दूर से लोग उनसे मिलने आने लगे। वह उनकी समस्या सुनते और उन्हें जड़ी-बूटियों की दवा भी देते। उन दिनों पूर्वांचल में अंग्रेज अपनी जड़ें जमा रहे थे। शम्भुधन को इनसे बहुत घृणा थी। वह लोगों को दवा देने के साथ-साथ देश और धर्म

पर आ रहे संकट से भी सावधान करते रहते थे। धीरे-धीरे उनके विचारों से प्रभावित लोगों की संख्या बढ़ने लगी।

एक समय डिमासा काछारी एक सबल राज्य था। इसकी राजधानी डिमापुर थी। पहले अहोम राजाओं ने और फिर अंग्रेजों ने 1832 ई0 में इसे नष्ट कर दिया। उस समय तुलाराम सेनापति राजा थे।

वे अंग्रेजों के प्रबल विरोधी थे। 1854 ई0 में उनका देहान्त हो गया। अब अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में फैले विद्रोह को दबाने के लिए राज्य को विभाजित कर दिया।

शम्भुधन ने इससे नाराज होकर एक क्रान्तिकारी दल बनाया और उसमें उत्साही युवाओं को भर्ती किया।
मूर्ति के हाथ मे जो डमरू देख रहे हो ना, वो पत्थर का है। ये तो कुछ भी नही है,डमरू पर जो रस्सी देख रहे हो ना, वह भी पत्थर की है। ओर तो ओर आप पत्थर की रस्सी के निचे उंगली भी डाल सकते हो इतनी जगह है।हुआ ना आश्चर्य।


अब जरा सोचिए बिना किसी तकनीक के क्या केवल छेनी और हथौड़ी से यह सब कैसे संभव है।
एक हल्की सी गलत चोट क्या पूरी मूर्ति को खराब नहीं कर सकती थी।
और अगर छेनी -हतोड़े से संभव है तो आज इतनी तकनीक के बावजूद भी इतनी सटीकता से कोई इसकी प्रतिलिपि क्यों नहीं बना पाता है।

ऐसे हजारों आश्चर्य है सनातन में लेकिन कुछ वामपंथी इतिहासकारों ने इनको आश्चर्य ही बनाकर रहने दिया किसी के सामने आने ही नहीं दिया और हमारी विडंबना देखिए कि हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन हमें हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई इन महान कलाकृतियों का ज्ञान भी नहीं है।

धन्य है हमारे वह पूर्वज जिन्होंने यह सब कुछ बनाया धन्य है हमारी सनातन संस्कृति।

केशव मन्दिर,कर्नाटक
रामायण के हर 1000 श्लोक के बाद आने वाले पहले अक्षर से गायत्री मंत्र बनता हैl

आपने बचपन से सुना होगा, कि जब भी किसी समस्या के कारण मन शांति खोने लगे तो ‘गायत्री मंत्र’ का जप करने से मन को शांति मिलती है. बल्कि अधिकतर प्रार्थनाओं में भी गायत्री मंत्र का उच्चारण किया जाता है.


बड़े-बुर्जुगों द्वारा कहा जाता है कि इस मंत्र के रोजाना उच्चारण करने मात्र से ही, कई समस्याओं और विपदाओं का नाश होता है. आपने भी ध्यान दिया होगा कि वेदों और पुराण में कई मंत्र ऐसे हैं जिनके बारे में कोई शायद ही जानता हो या फिर किसी को याद हो.


लेकिन ‘गायत्री मंत्र’ के बारे में अधिकतर लोग जानते हैं. शास्त्रों के अनुसार ‘गायत्री मंत्र’ की उत्पत्ति ऋषि विश्वामित्र ने अपने कठोर तप से की थी. ऋगवेद में यह मंत्र संस्कृत में लिखा गया था.


इसलिए गायत्री मंत्र का उच्चारण बहुत आवश्यक माना जाता है. गायत्री मंत्र से जुड़ी सबसे खास बात ये है कि इस मंत्र के उच्चारण से, होने वाले स्वास्थ्य लाभ के बारे में न केवल भारत में कई धारणाएं हैं


बल्कि विदेशों में भी समूह में गायत्री मंत्र का उच्चारण करने के लिए सेमिनार का आयोजन किया जाता है. दक्षिण अमेरिका में गायत्री मंत्र पर रोजाना विशेष कार्यक्रम, वहां के मुख्य रेडियो स्टेशनों पर किया जाता है...
शास्त्रों में स्वच्छता के सूत्र

हमारे पूर्वज अत्यंत दूरदर्शी थे। उन्होंने हजारों वर्षों पूर्व वेदों व पुराणों में महामारी की रोकथाम के लिए परिपूर्ण स्वच्छता रखने के लिए स्पष्ट निर्देश दे कर रखें हैं-


1. लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च ।
लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत् ।।
- धर्मसिन्धू ३पू. आह्निक

✍️नामक, घी, तेल, चावल, एवं अन्य खाद्य पदार्थ चम्मच से परोसना चाहिए हाथों से नही।

2. अनातुरः स्वानि खानि न स्पृशेदनिमित्ततः ।।
- मनुस्मृति ४/१४४

✍️अपने शरीर के अंगों जैसे आँख, नाक, कान आदि को बिना किसी कारण के छूना नही चाहिए।

3. अपमृज्यान्न च स्न्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभिः ।।
- मार्कण्डेय पुराण ३४/५२

✍️एक बार पहने हुए वस्त्र धोने के बाद ही पहनना चाहिए। स्नान के बाद अपने शरीर को शीघ्र सुखाना चाहिए।

4. हस्तपादे मुखे चैव पञ्चाद्रे भोजनं चरेत् ।।
- पद्म०सृष्टि.५१/८८
नाप्रक्षालितपाणिपादो भुञ्जीत ।।
- सुश्रुतसंहिता चिकित्सा २४/९८

✍️अपने हाथ, मुहँ व पैर स्वच्छ करने के बाद ही भोजन करना चाहिए।

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🌺श्री गरुड़ पुराण - संक्षिप्त वर्णन🌺

हिन्दु धर्म के 18 पुराणों में से एक गरुड़ पुराण का हिन्दु धर्म में बड़ा महत्व है। गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद सद्गती की व्याख्या मिलती है। इस पुराण के अधिष्ठातृ देव भगवान विष्णु हैं, इसलिए ये वैष्णव पुराण है।


गरुड़ पुराण के अनुसार हमारे कर्मों का फल हमें हमारे जीवन-काल में तो मिलता ही है परंतु मृत्यु के बाद भी अच्छे बुरे कार्यों का उनके अनुसार फल मिलता है। इस कारण इस पुराण में निहित ज्ञान को प्राप्त करने के लिए घर के किसी सदस्य की मृत्यु के बाद का समय निर्धारित किया गया है...

..ताकि उस समय हम जीवन-मरण से जुड़े सभी सत्य जान सकें और मृत्यु के कारण बिछडने वाले सदस्य का दुख कम हो सके।
गरुड़ पुराण में विष्णु की भक्ति व अवतारों का विस्तार से उसी प्रकार वर्णन मिलता है जिस प्रकार भगवत पुराण में।आरम्भ में मनु से सृष्टि की उत्पत्ति,ध्रुव चरित्र की कथा मिलती है।


तदुपरांत सुर्य व चंद्र ग्रहों के मंत्र, शिव-पार्वती मंत्र,इन्द्र सम्बंधित मंत्र,सरस्वती मंत्र और नौ शक्तियों के बारे में विस्तार से बताया गया है।
इस पुराण में उन्नीस हज़ार श्लोक बताए जाते हैं और इसे दो भागों में कहा जाता है।
प्रथम भाग में विष्णुभक्ति और पूजा विधियों का उल्लेख है।

मृत्यु के उपरांत गरुड़ पुराण के श्रवण का प्रावधान है ।
पुराण के द्वितीय भाग में 'प्रेतकल्प' का विस्तार से वर्णन और नरकों में जीव के पड़ने का वृत्तांत मिलता है। मरने के बाद मनुष्य की क्या गति होती है, उसका किस प्रकार की योनियों में जन्म होता है, प्रेत योनि से मुक्ति के उपाय...
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Moderna CEO Stephane Bancel was previously CEO of bioMerieux in France from 07-10.

Alain Merieux, who owns bioMerieux, was instrumental in the creation of the Wuhan Institute of Virology P4 Lab.

The same people who helped create the virus, also helped to create the vaccines...


Moderna partnered with French Pasteur Institute in 2015 to develop mRNA vaccine technology.

Pasteur Institute partnered with the Wuhan P4 Laboratory in 2017 along with the Merieux Foundation to study emerging viruses...
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Nobel prize winning scientist Luc Montagnier asserts that Sars-Cov-2 is man-made and originated from the Wuhan Institute of Virology.

Montagnier did extensive work with the Pasteur Institute in France which was partnered with the Wuhan P4.

Merieux Foundation & the Chinese government have worked together since 1965, and partnered to study emerging pathogens in Africa in 2015.

Their research included "PATHOGENS CARRIED BY BATS" that provoke respiratory diseases.

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