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Arts are best form to Express thoughts & devotion. In All civilization Arts played very important role to express sprituality. Tibbeten Tangkhas are prime example .

List of My Paintings & Sketches

प्रलय पयोधि-जले धृतवान् असि वेदम्
विहित वहित्र-चरित्रम् अखेदम्
केशव धृत-मीन-शरीर, जय जगदीश हरे!!
छलयसि विक्रमणे बलिम् अद्भुत-वामन
पद-नख-नीर-जनित-जन-पावन
केशव धृत-वामन रूप जय जगदीश हरे
नंदसि यज्ञ- विधेर् अहः श्रुति जातम्
सदय-हृदय-दर्शित-पशु-घातम्
केशव धृत-बुद्ध-शरीर जय जगदीश हरे
क्षत्रिय-रुधिर-मये जगद् -अपगत-पापम्
स्नपयसि पयसि शमित-भव-तापम्
केशव धृत-भृगुपति रूप जय जगदीश हरे
वसति दशन शिखरे धरणी तव लग्ना
शशिनि कलंक कलेव निमग्ना
केशव धृत शूकर रूप जय जगदीश हरे
वितरसि दिक्षु रणे दिक्-पति-कमनीयम्
दश-मुख-मौलि-बलिम् रमणीयम् |
केशव धृत-राम-शरीर जय जगदीश हरे
दीपार्चिरेव हि दशांतरं अभ्युपेत्य
दीपायते विवृत-हेतु-समान-धर्म
यस्तादृगेव हि च विष्णुतया विभाति
गोविंदं आदिपुरुषं तमहं भजामि!
वेदान् उद्धरते जगंति वहते भू-गोलम् उद्बिभ्रते
दैत्यम् दारयते बलिम् छलयते क्षत्र-क्षयम् कुर्वते
पौलस्त्यम् जयते हलम् कलयते कारुण्यम् आतन्वते
म्लेच्छान् मूर्छयते दशाकृति-कृते कृष्णाय तुभ्यम् नमः
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानंद विग्रहः
अनादिरादिर्गॊविंदः सर्व कारण कारणं

चिंतामणि-प्रकर-सद्मिसु कल्पवृक्ष-
लक्षावृतेषु सुरभिरभिपालयंतं
लक्श्मी-सहस्र-शत-संभ्रम-सेव्यमानं
गोविंदं आदिपुरुषं तमहं भजामि!!
क्षीरं यथा दधि विकार-विशेष योगात्
संजायते न हि ततः पृथगस्ति हेतोः
यः शंभुतामपि तथा समुपैति कार्याद्
गोविंदं आदिपुरुषं तमहं भजामि!!
यत्-पाद-पल्लव-युगं विनिधाय कुंभ
द्वंद्वे प्रणाम-समये स गणाधिराजः
विघ्नान् विहंतं आलं अस्य जगत्-त्रयस्य
गोविंदं आदिपुरुषं तमहं भजामि!!
अद्वैतं अच्युतं अनादिं अनंत-रूपं
आद्यं पुराणपुरुषं नव-यौवनंच
वेदेषु दुर्लभं अदुर्लभं आत्म-भक्तौ
गोविंदं आदिपुरुषं तमहं भजामि!!
भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा
जात: करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि ।
वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोऽतदर्हान्
शूद्रान् कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते !!
जय जय गोराचाँदेर आरति को शोभा।
जाह्नवी - तटवने जगमन - लोभा !
दक्षिणे निताइचाँद , बामे गदाधर।
निकटेअद्वैत श्रीनिवास छत्रधर!
बसियाछे गोराचाँदरत्नसिंहासने।
आरति करेन ब्रह्मा - आदिदेवगणे!
नरहरि आदिकरि ' चामर ढुलाय।
सञ्जयमुकुन्द - वासुघोष - आदि गाय
शंख बाजे घण्टा बाजे , बाजे करताल ।

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कुंडली में 12 भाव होते हैं। कैसे ज्योतिष द्वारा रोग के आंकलन करते समय कुंडली के विभिन्न भावों से गणना करते हैं आज इस पर चर्चा करेंगे।
कुण्डली को कालपुरुष की संज्ञा देकर इसमें शरीर के अंगों को स्थापित कर उनसे रोग, रोगेश, रोग को बढ़ाने घटाने वाले ग्रह


रोग की स्थिति में उत्प्रेरक का कार्य करने वाले ग्रह, आयुर्वेदिक/ऐलोपैथी/होमियोपैथी में से कौन कारगर होगा इसका आँकलन, रक्त विकार, रक्त और आपरेशन की स्थिति, कौन सा आंतरिक या बाहरी अंग प्रभावित होगा इत्यादि गणना करने में कुंडली का प्रयोग किया जाता है।


मेडिकल ज्योतिष में आज के समय में Dr. K. S. Charak का नाम निर्विवाद रूप से प्रथम स्थान रखता है। उनकी लिखी कई पुस्तकें आज इस क्षेत्र में नए ज्योतिषों का मार्गदर्शन कर रही हैं।
प्रथम भाव -
इस भाव से हम व्यक्ति की रोगप्रतिरोधक क्षमता, सिर, मष्तिस्क का विचार करते हैं।


द्वितीय भाव-
दाहिना नेत्र, मुख, वाणी, नाक, गर्दन व गले के ऊपरी भाग का विचार होता है।
तृतीय भाव-
अस्थि, गला,कान, हाथ, कंधे व छाती के आंतरिक अंगों का शुरुआती भाग इत्यादि।

चतुर्थ भाव- छाती व इसके आंतरिक अंग, जातक की मानसिक स्थिति/प्रकृति, स्तन आदि की गणना की जाती है


पंचम भाव-
जातक की बुद्धि व उसकी तीव्रता,पीठ, पसलियां,पेट, हृदय की स्थिति आंकलन में प्रयोग होता है।

षष्ठ भाव-
रोग भाव कहा जाता है। कुंडली मे इसके तत्कालिक भाव स्वामी, कालपुरुष कुंडली के स्वामी, दृष्टि संबंध, रोगेश की स्थिति, रोगेश के नक्षत्र औऱ रोगेश व भाव की डिग्री इत्यादि।

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